भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2862

प्रिय करनेके कारण वे अक्षय लोकोंमें चले गये ॥ २९-३० ॥ तस्यास्थिभिरथो शक्रः सम्प्रहृष्टमनास्तदा । कारयामास दिव्यानि नानाप्रहरणानि च ॥ ३१ ॥ गदावज्राणि चक्राणि गुरून् दण्डांश्च पुष्कलान् । तब इन्द्रने प्रसन्नचित्त होकर दधीचकी हड्डियोंसे गदा, वज्र, चक्र और बहुसंख्यक भारी दण्ड आदि नाना प्रकारके दिव्य आयुध तैयार कराये ॥ ३१ १/२ ॥ स हि तीव्रेण तपसा सम्भृतः परमर्षिणा ॥ ३२ ॥ प्रजापतिसुतेनाथ भृगुणा लोकभावनः । अतिकायः स तेजस्वी लोकसारो विनिर्मितः ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजीके पुत्र महर्षि भृगुने तीव्र तपस्यासे भरे हुए लोकमंगलकारी विशालकाय एवं तेजस्वी दधीचको उत्पन्न किया था। ऐसा जान पड़ता था, मानो सम्पूर्ण जगत्के सारतत्त्वसे उनका निर्माण किया गया हो ॥ ३२-३३ ॥ जज्ञे शैलगुरुः प्रांशुर्महिम्ना प्रथितः प्रभुः । नित्यमुद्विजते चास्य तेजसः पाकशासनः ॥ ३४ ॥ वे पर्वतके समान भारी और ऊँचे थे। अपनी महत्ताके लिये वे सामर्थ्यशाली मुनि सर्वत्र विख्यात थे। पाकशासन इन्द्र उनके तेजसे सदा उद्विग्न रहते थे ॥ ३४ ॥ तेन वज्रेण भगवान् मन्त्रयुक्तेन भारत । भृशं क्रोधविसृष्टेन ब्रह्मतेजोद्भवेन च ॥ ३५ ॥ दैत्यदानववीराणां जघान नवतीर्नव । भरतनन्दन! ब्रह्मतेजसे प्रकट हुए उस वज्रको मन्त्रोच्चारणके साथ अत्यन्त क्रोधपूर्वक छोड़कर भगवान् इन्द्रने आठ सौ दस दैत्य-दानव वीरोंका वध कर डाला ॥ ३५ १/२ ॥ अथ काले व्यतिक्रान्ते महत्यतिभयंकरे ॥ ३६ ॥ अनावृष्टिरनुप्राप्ता राजन् द्वादशवार्षिकी । राजन्! तदनन्तर सुदीर्घ काल व्यतीत होनेपर जगत्में बारह वर्षोंतक स्थिर रहनेवाली अत्यन्त भयंकर अनावृष्टि प्राप्त हुई ॥ ३६ १/२ ॥ तस्यां द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महर्षयः ॥ ३७ ॥ वृत्त्यर्थं प्राद्रवन् राजन् क्षुधार्ताः सर्वतोदिशम् । नरेश्वर! बारह वर्षोंकी उस अनावृष्टिमें सब महर्षि भूखसे पीड़ित हो जीविकाके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ने लगे ॥ ३७ १/२ ॥ दिग्भ्यस्तान् प्रद्रुतान् दृष्ट्वा मुनिः सारस्वतस्तदा ॥ ३८ ॥ गमनाय मतिं चक्रे तं प्रोवाच सरस्वती । सम्पूर्ण दिशाओंसे भागकर इधर-उधर जाते हुए उन महर्षियोंको देखकर सारस्वत मुनिने भी वहाँसे अन्यत्र जानेका विचार किया। तब सरस्वतीदेवीने उनसे कहा ।।