भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2868

इत्युक्ते चास्या जग्राह पाणिं गालवसम्भवः ।। १४ ।। ऋषिः प्राक् शृङ्गवान्नाम समयं चेममब्रवीत् । समयेन तवाद्याहं पाणिं स्प्रक्ष्यामि शोभने ।। १५ ।। यद्येकरात्रं वस्तव्यं त्वया सह मयेति ह । उसके ऐसा कहनेपर सबसे पहले गालवके पुत्र शृंगवान् ऋषिने उसका पाणिग्रहण करनेकी इच्छा प्रकट की और सबसे पहले उसके सामने यह शर्त रखी—'शोभने! मैं एक शर्तके साथ आज तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा। विवाहके बाद तुम्हें एक रात मेरे साथ रहना होगा। यदि यह स्वीकार हो तो मैं तैयार हूँ' ।। १४-१५ १/२ ।। तथेति सा प्रतिश्रुत्य तस्मै पाणिं ददौ तदा ।। १६ ।। यथादृष्टेन विधिना हुत्वा चाग्निं विधानतः । चक्रे च पाणिग्रहणं तस्योद्वाहं च गालविः ।। १७ ।। तब 'बहुत अच्छा' कहकर उसने मुनिके हाथमें अपना हाथ दे दिया। फिर गालवपुत्रने शास्त्रोक्त रीतिसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके उसका पाणिग्रहण और विवाह-संस्कार किया ।। १६-१७ ।। सा रात्रावभवद् राजंस्तरुणी वरवर्णिनी । दिव्याभरणवस्त्रा च दिव्यगन्धानुलेपना ।। १८ ।। राजन्! रात्रिमें वह दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और दिव्य गन्धयुक्त अंगरागसे अलंकृत परम सुन्दरी तरुणी हो गयी ।। १८ ।। तां दृष्ट्वा गालविः प्रीतो दीपयन्तीमिव श्रिया । उवास च क्षपामेकां प्रभाते साब्रवीच्च तम् ।। १९ ।। उसे अपनी कान्तिसे सब ओर प्रकाश फैलाती देख गालवकुमार बड़े प्रसन्न हुए और उसके साथ एक रात निवास किया। सबेरा होते ही वह मुनिसे बोली— ।। १९ ।। यस्त्वया समयो विप्र कृतो मे तपतां वर । तेनोषितास्मि भद्रं ते स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ।। २० ।। 'तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! आपने जो शर्त की थी, उसके अनुसार मैं आपके साथ रह चुकी। आपका मंगल हो, कल्याण हो। अब आज्ञा दीजिये, मैं जाती हूँ' ।। २० ।। सा निर्गताब्रवीद् भूयो योऽस्मिंस्तीर्थे समाहितः । वसते रजनीमेकां तर्पयित्वा दिवौकसः ।। २१ ।। चत्वारिंशतमष्टौ च द्वौ चाष्टौ सम्यगाचरेत् । यो ब्रह्मचर्यं वर्षाणि फलं तस्य लभेत सः ।। २२ ।। यों कहकर वह वहाँसे चल दी। जाते-जाते उसने फिर कहा—'जो अपने चित्तको एकाग्र कर इस तीर्थमें स्नान और देवताओंका तर्पण करके एक रात निवास करेगा, उसे अट्ठावन वर्षोंतक विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य पालन करनेका फल प्राप्त होगा' ।। २१-२२ ।।