महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चत्रिंशोऽध्यायः
युधिष्ठिर और अभिमन्युका संवाद तथा व्यूहभेदनके लिये अभिमन्युकी प्रतिज्ञा
संजय उवाच
तदनीकमनाधृष्यं भारद्वाजेन रक्षितम् ।
पार्थाः समभ्यवर्तन्त भीमसेनपुरोगमाः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! द्रोणाचार्यके द्वारा सुरक्षित उस दुर्धर्ष सेनाका भीमसेन आदि कुन्तीपुत्रोंने डटकर सामना किया ॥ १ ॥
सात्यकिश्चेकितानश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।
कुन्तिभोजश्च विक्रान्तो द्रुपदश्च महारथः ॥ २ ॥
आर्जुनिः क्षत्रधर्मा च बृहत्क्षत्रश्च वीर्यवान् ।
चेदिपो धृष्टकेतुश्च माद्रीपुत्रौ घटोत्कचः ॥ ३ ॥
युधामन्युश्च विक्रान्तः शिखण्डी चापराजितः ।
उत्तमौजाश्च दुर्धर्षो विराटश्च महारथः ॥ ४ ॥
द्रौपदेयाश्च संरब्धाः शैशुपालिश्च वीर्यवान् ।
केकयाश्च महावीर्याः सृञ्जयाश्च सहस्रशः ॥ ५ ॥
एते चान्ये च सगणाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ।
समभ्यधावन् सहसा भारद्वाजं युयुत्सवः ॥ ६ ॥
सात्यकि, चेकितान, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, पराक्रमी कुन्तिभोज, महारथी द्रुपद, अभिमन्यु, क्षत्रधर्मा, शक्तिशाली बृहत्क्षत्र, चेदिराज धृष्टकेतु, माद्रीकुमार नकुल-सहदेव, घटोत्कच, पराक्रमी युधामन्यु, किसीसे परास्त न होनेवाला वीर शिखण्डी, दुर्धर्षवीर उत्तमौजा, महारथी विराट, क्रोधमें भरे हुए द्रौपदीपुत्र, बलवान् शिशुपालकुमार, महापराक्रमी केकयराजकुमार तथा सहस्रों सृंजयवंशी क्षत्रिय—ये तथा और भी अस्त्रविद्यामें पारंगत एवं रणदुर्मद बहुत-से शूरवीर अपने दलबलके साथ वहाँ उपस्थित थे। इन सबने युद्धकी अभिलाषासे द्रोणाचार्यपर सहसा धावा किया ॥ २–६ ॥
समीपे वर्तमानांस्तान् भारद्वाजोऽतिवीर्यवान् ।
असम्भ्रान्तः शरौघेन महता समवारयत् ॥ ७ ॥
भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य बड़े पराक्रमी थे। शत्रुओंके आक्रमणसे उन्हें तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने अपने समीप आये हुए पाण्डव-वीरोंको बाणसमूहोंकी भारी वृष्टि करके आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ७ ॥