महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2882, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमया श्रुतं कथयतामृषीणां राजसत्तम ॥ ६ ॥ कुरुक्षेत्रं परं पुण्यं पावनं स्वर्ग्यमेव च । दैवतैर्ऋषिभिर्जुष्टं ब्राह्मणैश्च महात्मभिः ॥ ७ ॥ ‘नृपश्रेष्ठ! मैंने माहात्म्य-कथा कहनेवाले ऋषियोंके मुखसे यह सुना है कि कुरुक्षेत्र परम पावन पुण्यमय तीर्थ है। वह स्वर्ग प्रदान करनेवाला है। देवता, ऋषि तथा महात्मा ब्राह्मण सदा उसका सेवन करते हैं ॥ ६-७ ॥
तत्र वै योत्स्यमाना ये देहं त्यक्ष्यन्ति मानवाः । तेषां स्वर्गे ध्रुवो वासः शक्रेण सह मारिष ॥ ८ ॥ ‘माननीय नरेश! जो मानव वहाँ युद्ध करते हुए अपने शरीरका त्याग करेंगे, उनका निश्चय ही स्वर्गलोकमें इन्द्रके साथ निवास होगा ॥ ८ ॥
तस्मात् समन्तपञ्चकमितो याम द्रुतं नृप । प्रथितोत्तरवेदी सा देवलोके प्रजापतेः ॥ ९ ॥ तस्मिन् महापुण्यतमे त्रैलोक्यस्य सनातने । संग्रामे निधनं प्राप्य ध्रुवं स्वर्गे भविष्यति ॥ १० ॥ ‘अतः नरेश्वर! हम सब लोग यहाँसे शीघ्र ही समन्तपंचक तीर्थमें चलें। वह भूमि देवलोकमें प्रजापतिकी उत्तरवेदीके नामसे प्रसिद्ध है। त्रिलोकीके उस परम पुण्यतम सनातन तीर्थमें युद्ध करके मृत्युको प्राप्त हुआ मनुष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जायगा’ ॥ ९-१० ॥
तथेत्युक्त्वा महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । समन्तपञ्चकं वीरः प्रायादभिमुखः प्रभुः ॥ ११ ॥ ततो दुर्योधनो राजा प्रगृह्य महतीं गदाम् । पद्भ्याममर्षी द्युतिमानगच्छत् पाण्डवैः सह ॥ १२ ॥ महाराज! तब ‘बहुत अच्छा’, कहकर वीर राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर समन्तपंचक तीर्थकी ओर चल दिये। उस समय अमर्षमें भरा हुआ तेजस्वी राजा दुर्योधन हाथमें विशाल गदा लेकर पाण्डवोंके साथ पैदल ही चला ॥ ११-१२ ॥
तथाऽऽयान्तं गदाहस्तं वर्मणा चापि दंशितम् । अन्तरिक्षचरा देवाः साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ १३ ॥ गदा हाथमें लिये कवच धारण किये दुर्योधनको इस प्रकार आते देख आकाशमें विचरनेवाले देवता साधु-साधु कहकर उसकी प्रशंसा करने लगे ॥ १३ ॥
वातिकाश्चारणा ये तु दृष्ट्वा ते हर्षमागताः । स पाण्डवैः परिवृतः कुरुराजस्तवात्मजः ॥ १४ ॥ मत्तस्येव गजेन्द्रस्य गतिमास्थाय सोऽव्रजत् ।