महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2920, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवयमेवाधुना शोच्याः सर्वावस्थासु कौरव ।। २७ ।।
कृपणं वर्तयिष्यामस्तैर्हीना बन्धुभिः प्रियैः ।
‘अनघ! तुम्हें अपने लिये शोक नहीं करना चाहिये, तुम्हारी प्रशंसनीय मृत्यु हो रही है। कुरुराज! अब तो सभी अवस्थाओंमें इस समय हमलोग ही शोचनीय हो गये हैं; क्योंकि उन प्रिय बन्धु-बान्धवोंसे रहित होकर हमें दीनतापूर्ण जीवन व्यतीत करना पड़ेगा ।। २७ १/२ ।।
भ्रातॄणां चैव पुत्राणां तथा वै शोकविह्वलाः ।। २८ ।।
कथं द्रक्ष्यामि विधवा वधूः शोकपरिप्लुताः ।
‘भला, मैं भाइयों और पुत्रोंकी उन शोकविह्वला और दुःखमें डूबी हुई विधवा बहुओंको कैसे देख सकूँगा ।। २८ १/२ ।।
त्वमेकः सुस्थितो राजन् स्वर्गे ते निलयो ध्रुवः ।। २९ ।।
वयं नरकसंज्ञं वै दुःखं प्राप्स्याम दारुणम् ।
‘राजन्! तुम अकेले सुखी हो। निश्चय ही स्वर्गमें तुम्हें स्थान प्राप्त होगा और हमें यहाँ नरकतुल्य दारुण दुःख भोगना पड़ेगा ।। २९ १/२ ।।
स्नुषाश्च प्रस्नुषाश्चैव धृतराष्ट्रस्य विह्वलाः ।
गर्हयिष्यन्ति नो नूनं विधवाः शोककर्शिताः ।। ३० ।।
‘धृतराष्ट्रकी वे शोकातुर एवं व्याकुल विधवा पुत्रवधुएँ और पौत्रवधुएँ भी निश्चय ही हमलोगोंकी निन्दा करेंगी’ ।। ३० ।।
संजय उवाच
एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो निश्श्वास स पार्थिवः ।
विललाप चिरं चापि धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ३१ ।।
**संजय कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखसे आतुर हो लंबी साँस छोड़ते हुए बहुत देरतक विलाप करते रहे ।। ३१ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि युधिष्ठिरविलापे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ।। ५९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें युधिष्ठिरका विलापविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५९ ।।