भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2923

उस समय श्रीकृष्णने रोषसे भरे हुए बलरामजीको शान्त करते हुए-से कहा—'भैया! अपनी उन्नति छः प्रकारकी होती है—अपनी वृद्धि, मित्रकी वृद्धि और मित्रके मित्रकी वृद्धि तथा शत्रुपक्षमें इसके विपरीत स्थिति अर्थात् शत्रुकी हानि, शत्रुके मित्रकी हानि तथा शत्रुके मित्रके मित्रकी हानि ।।

आत्मन्यपि च मित्रे च विपरीतं यदा भवेत् ।। १४ ।।
तदा विद्यान्मनोग्लानिमाशु शान्तिकरो भवेत् ।
'अपनी और अपने मित्रकी यदि इसके विपरीत परिस्थिति हो तो मन-ही-मन ग्लानिका अनुभव करना चाहिये और मित्रोंकी उस हानिके निवारणके लिये शीघ्र प्रयत्नशील होना चाहिये ।। १४½ ।।

अस्माकं सहजं मित्रं पाण्डवाः शुद्धपौरुषाः ।। १५ ।।
स्वकाः पितृष्वसुः पुत्रास्ते परैर्निकृता भृशम् ।
'शुद्ध पुरुषार्थका आश्रय लेनेवाले पाण्डव हमारे सहज मित्र हैं। बुआके पुत्र होनेके कारण सर्वथा अपने हैं। शत्रुओंने इनके साथ बहुत छल-कपट किया था ।।

प्रतिज्ञापालनं धर्मः क्षत्रियस्येह वेद्यहम् ।। १६ ।।
सुयोधनस्य गदया भङ्क्तास्म्यूरू महाहवे ।
इति पूर्वं प्रतिज्ञातं भीमेन हि सभातले ।। १७ ।।
'मैं समझता हूँ कि इस जगत्में अपनी प्रतिज्ञाका पालन करना क्षत्रियके लिये धर्म ही है। पहले सभामें भीमसेनने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'मैं महायुद्धमें अपनी गदासे दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा' ।। १६-१७ ।।

मैत्रेयेणाभिशप्तश्च पूर्वमेव महर्षिणा ।
ऊरू ते भेत्स्यते भीमो गदयेति परंतप ।। १८ ।।
'शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजी! महर्षि मैत्रेयने भी दुर्योधनको पहलेसे ही यह शाप दे रखा था कि 'भीमसेन अपनी गदासे तेरी दोनों जाँघें तोड़ डालेंगे' ।।

अतो दोषं न पश्यामि मा क्रुद्ध्यस्व प्रलम्बहन् ।
यौनः स्वैः सुखहार्दैश्च सम्बन्धः सह पाण्डवैः ।। १९ ।।
तेषां वृद्ध्या हि वृद्धिन्नौ मा क्रुधः पुरुषर्षभ ।
'अतः प्रलम्बहन्ता बलभद्रजी! मैं इसमें भीमसेनका कोई दोष नहीं देखता; इसलिये आप क्रोध न कीजिये। हमारा पाण्डवोंके साथ यौन-सम्बन्ध तो है ही। परस्पर सुख देनेवाले सौहार्दसे भी हमलोग बँधे हुए हैं। पुरुषप्रवर! इन पाण्डवोंकी वृद्धिसे हमारी भी वृद्धि है, अतः आप क्रोध न करें' ।। १९½ ।।

वासुदेववचः श्रुत्वा सीरभृत् प्राह धर्मवित् ।। २० ।।
धर्मः सुचरितः सद्भिः स च द्वाभ्यां नियच्छति ।