भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2926

युद्धदीक्षां प्रविश्याजौ रणयज्ञं वितत्य च । हुत्वाऽऽत्मानममित्राग्नौ प्राप चावभृथं यशः ॥ २९ ॥ 'युद्धकी दीक्षा ले संग्रामभूमिमें प्रविष्ट हो रणयज्ञका विस्तार करके शत्रुरूपी प्रज्वलित अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दुर्योधनने सुयशरूपी अवभृथ-स्नानका शुभ अवसर प्राप्त किया है' ॥ २९ ॥

इत्युक्त्वा रथमास्थाय रौहिणेयः प्रतापवान् । श्वेताभ्रशिखराकारः प्रययौ द्वारकां प्रति ॥ ३० ॥ यह कहकर प्रतापी रोहिणीनन्दन बलरामजी, जो श्वेत बादलोंके अग्रभागकी भाँति गौर-कान्तिसे सुशोभित हो रहे थे, रथपर आरूढ़ हो द्वारकाकी ओर चल दिये ॥ ३० ॥

पञ्चालाश्च सवार्ष्णेयाः पाण्डवाश्च विशाम्पते । रामे द्वारावतीं याते नातिप्रमनसोऽभवन् ॥ ३१ ॥ प्रजानाथ! बलरामजीके इस प्रकार द्वारका चले जानेपर पांचाल, वृष्णिवंशी तथा पाण्डववीर उदास हो गये। उनके मनमें अधिक उत्साह नहीं रह गया ॥ ३१ ॥

ततो युधिष्ठिरं दीनं चिन्तापरमधोमुखम् । शोकोपहतसंकल्पं वासुदेवोऽब्रवीदिदम् ॥ ३२ ॥ उस समय युधिष्ठिर बहुत दुःखी थे। वे नीचे मुख किये चिन्तामें डूब गये थे। शोकसे उनका मनोरथ भंग हो गया था। उस अवस्थामें उनसे भगवान् श्रीकृष्ण बोले ॥ ३२ ॥

वासुदेव उवाच

धर्मराज किमर्थं त्वमधर्ममनुमन्यसे । हतबन्धोर्यदेतस्य पतितस्य विचेतसः ॥ ३३ ॥ दुर्योधनस्य भीमेन मृद्यमानं शिरः पदा । उप्रेक्षसि कस्मात् त्वं धर्मज्ञः सन्नराधिप ॥ ३४ ॥ श्रीकृष्णने पूछा—धर्मराज! आप चुप होकर अधर्मका अनुमोदन क्यों कर रहे हैं? नरेश्वर दुर्योधनके भाई और सहायक मारे जा चुके हैं। यह पृथ्वीपर गिरकर अचेत हो रहा है। ऐसी दशामें भीमसेन इसके मस्तकको पैरसे कुचल रहे हैं। आप धर्मज्ञ होकर समीपसे ही यह सब कैसे देख रहे हैं ॥ ३३-३४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

न ममैतत् प्रियं कृष्ण यद् राजानं वृकोदरः । पदा मूर्ध्यस्पृशत् क्रोधान्न च हृष्ये कुलक्षये ॥ ३५ ॥ युधिष्ठिरने कहा—श्रीकृष्ण! भीमसेनने क्रोधमें भरकर जो राजा दुर्योधनके मस्तकको पैरोंसे ठुकराया है, यह मुझे भी अच्छा नहीं लगा। अपने कुलका संहार हो जानेसे मैं प्रसन्न नहीं हूँ ॥ ३५ ॥