भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 294

ततोऽभिमन्युः प्रहसन् सारथिं वाक्यमब्रवीत् । सारथे को न्वयं द्रोणः समग्रं क्षत्रमेव वा ।। ५ ।। ऐरावतगतं शक्रं सहामरगणैरहम् । अथवा रुद्रमीशानं सर्वभूतगणार्चितम् । योधयेयं रणमुखे न मे क्षत्रेऽद्य विस्मयः ।। ६ ।। तब अभिमन्युने हँसते-हँसते सारथिसे इस प्रकार कहा—‘सारथे! इन द्रोणाचार्य अथवा सम्पूर्ण क्षत्रिय-मण्डलकी तो बात ही क्या, मैं तो ऐरावत पर चढ़े हुए सम्पूर्ण देवगणों-सहित इन्द्रके अथवा समस्त प्राणियोंद्वारा पूजित एवं सबके ईश्वर रुद्रदेवके साथ भी सामने खड़ा होकर युद्ध कर सकता हूँ। अतः इस समय इस क्षत्रियसमूहके साथ युद्ध करनेमें मुझे आज कोई आश्चर्य नहीं हो रहा है ।। ५-६ ।। न ममैतद् द्विषत्सैन्यं कलामर्हति षोडशीम् । अपि विश्वजितं विष्णुं मातुलं प्राप्य सूतज ।। ७ ।। पितरं चार्जुनं युद्धे न भीर्मामुपयास्यति । ‘शत्रुओंकी यह सारी सेना मेरी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। सूतनन्दन! विश्वविजयी विष्णुस्वरूप मामा श्रीकृष्णको तथा पिता अर्जुनको भी युद्धमें विपक्षीके रूपमें सामने पाकर मुझे भय नहीं होगा’ ।। ७ १/२ ।। अभिमन्युश्च तां वाचं कदर्थीकृत्य सारथेः ।। ८ ।। याहीत्येवाब्रवीदेनं द्रोणानीकाय मा चिरम् । अभिमन्युने सारथिके पूर्वोक्त कथनकी अवहेलना करके उससे यही कहा—‘तुम शीघ्र द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर चलो’ ।। ८ १/२ ।।