भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2950

त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो यन्मां पृच्छसि पार्थिव । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावद् भरतर्षभ ॥ ७ ॥ वैशम्पायनजीने कहा— भरतकुलभूषण नरेश! तुमने जो प्रश्न किया है, वह सर्वथा उचित है। तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब मैं तुझे यथार्थरूपसे बताऊँगा ।। हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे । व्युत्क्रम्य समयं राजन् धार्तराष्ट्रं महाबलम् ॥ ८ ॥ अन्यायेन हतं दृष्ट्वा गदायुद्धेन भारत । युधिष्ठिरं महाराज महत् भयमाविशत् ॥ ९ ॥ राजन्! भरतवंशी महाराज! धृतराष्ट्रपुत्र महाबली दुर्योधनको भीमसेनेने युद्धमें उसके नियमका उल्लङ्घन करके मारा है। वह गदायुद्धके द्वारा मारा गया है। इन सब बातोंपर दृष्टिपात करके युधिष्ठिरके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। ८-९ ।। चिन्तयानो महाभागां गान्धारीं तपसान्विताम् । घोरेण तपसा युक्तां त्रैलोक्यमपि सा दहेत् ॥ १० ॥ वे घोर तपस्यासे युक्त महाभागा तपस्विनी गान्धारी देवीका चिन्तन करने लगे। उन्होंने सोचा 'गान्धारी देवी कुपित होनेपर तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर सकती हैं' ।। तस्य चिन्तयमानस्य बुद्धिः समभवत् तदा । गान्धार्याः क्रोधदीप्तायाः पूर्वं प्रशमनं भवेत् ॥ ११ ॥ इस प्रकार चिन्ता करते हुए राजा युधिष्ठिरके हृदयमें उस समय यह विचार हुआ कि पहले क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त कर देना चाहिये ।। सा हि पुत्रवधं श्रुत्वा कृतमस्माभीरीदृशम् । मानसेनाग्निना क्रुद्धा भस्मसान्नः करिष्यति ॥ १२ ॥ वे हमलोगोंके द्वारा इस तरह पुत्रका वध किया गया सुनकर कुपित हो अपने संकल्पजनित अग्निसे हमें भस्म कर डालेंगी ।। १२ ।। कथं दुःखमिदं तीव्रं गान्धारी सा सहिष्यति । श्रुत्वा विनिहतं पुत्रं छलेनाजिह्मयोधिनम् ॥ १३ ॥ उनका पुत्र सरलतासे युद्ध कर रहा था; परंतु छलसे मारा गया। यह सुनकर गान्धारी देवी इस तीव्र दुःखको कैसे सह सकेंगी? ।। १३ ।। एवं विचिन्त्य बहुधा भयशोकसमन्वितः । वासुदेवमिदं वाक्यं धर्मराजोऽभ्यभाषत ॥ १४ ॥ इस तरह अनेक प्रकारसे विचार करके धर्मराज युधिष्ठिर भय और शोकमें डूब गये और वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले— ।। १४ ।। तव प्रसादाद् गोविन्द राज्यं निहतकण्टकम् । अप्राप्यं मनसापीदं प्राप्तमस्माभिरच्युत ॥ १५ ॥