महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह अति भयंकर संग्राम चल ही रहा था कि द्रोणाचार्यके देखते-देखते अर्जुनकुमार अभिमन्यु व्यूह तोड़कर भीतर घुस गया ।। १५ ।।
(तदभेद्यमनाधृष्यं द्रोणानीकं सुदुर्जयम् ।
भित्त्वाऽऽर्जुनिरसम्भ्रान्तो विवेशाचिन्त्यविक्रमः ॥)
अभिमन्युका पराक्रम अचिन्त्य था। उसने बिना किसी घबराहट के द्रोणाचार्यके अत्यन्त दुर्जय एवं दुर्धर्ष सैन्य-व्यूहको भंग करके उसके भीतर प्रवेश किया।
तं प्रविष्टं विनिघ्नन्तं शत्रुसंघान् महाबलम् ।
हस्त्यश्वरथपत्त्यौघाः परिवव्रुरुदायुधाः ॥ १६ ॥
व्यूहके भीतर घुसकर शत्रुसमूहोंका विनाश करते हुए महाबली अभिमन्युको हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये गजारोही, अश्वारोही, रथी और पैदल योद्धाओंके भिन्न-भिन्न दलोंने चारों ओरसे घेर लिया ।। १६ ।।
नानावादित्रनिनदैः क्ष्वेडितोत्कृष्टगर्जितैः ।
हुंकारैः सिंहनादैश्च तिष्ठ तिष्ठेति निःस्वनैः ॥ १७ ॥
घोरैर्हलहलाशब्दैर्मा गास्तिष्ठेहि मामिति ।
असावहममुत्रेति प्रवदन्तो मुहुर्मुहुः ॥ १८ ॥
बृंहितैः सिंजितैर्हासैः करनेमिस्वनैरपि ।
संनादयन्तो वसुधामभिदुद्रुवुरार्जुनम् ॥ १९ ॥
नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि, कोलाहल, ललकार, गर्जना, हुंकार, सिंहनाद, 'ठहरो, ठहरो' की आवाज और घोर हलहला शब्दके साथ 'न जाओ, खड़े रहो, मेरे पास आओ, तुम्हारा शत्रु मैं तो यहाँ हूँ' इत्यादि बातें बारंबार कहते हुए वीर सैनिक हाथियोंके चिग्घाड़, घुँघुरुओंकी रुनझुन, अट्टाहस, हाथोंकी तालीके शब्द तथा पहियोंकी घर्घराहटसे सारी वसुधाको गुँजाते हुए अर्जुनकुमारपर टूट पड़े ।। १७—१९ ।।
तेषामापततां वीरः शीघ्रयोधी महाबलः ।
क्षिप्राम्रो न्यवधीद् राजन् मर्मज्ञो मर्मभेदिभिः ॥ २० ॥
राजन्! महाबली वीर अभिमन्यु शीघ्रतापूर्वक युद्ध करनेमें कुशल, जल्दी-जल्दी अस्त्र चलानेवाला और शत्रुओंके मर्मस्थानोंको जाननेवाला था। वह अपनी ओर आते हुए शत्रु-सैनिकोंका मर्मभेदी बाणोंद्वारा वध करने लगा ।। २० ।।
ते हन्यमाना विवशा नानालिङ्गैः शितैः शरैः ।
अभिपेतूः सुबहुशः शलभा इव पावकम् ॥ २१ ॥
नाना प्रकारके चिह्नोंसे सुशोभित पैने बाणोंकी मार खाकर वे बहुसंख्यक कौरववीर विवश हो धरतीपर गिर पड़े, मानो ढेर-के-ढेर फतिंगे जलती आगमें पड़ गये हों ।। २१ ।।
ततस्तेषां शरीरैश्च शरीरावयवैश्च सः ।
संतस्तार क्षितिं क्षिप्रं कुशैर्वेदिमिवाध्वरे ॥ २२ ॥