महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2961, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीष्मे शान्तनवे नाथे कर्णे शस्त्रभृतां वरे ।। ७ ।। गौतमे शकुनौ चापि द्रोणे चास्त्रभृतां वरे । अश्वत्थाम्नि तथा शल्ये शूरे च कृतवर्मणि ।। ८ ।। इमामवस्थां प्राप्तोऽस्मि कालो हि दुरतिक्रमः । ‘शान्तनुनन्दन भीष्म, अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण, कृपाचार्य, शकुनि, अस्त्रधारियोंमें सर्वश्रेष्ठ द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, शूरवीर शल्य तथा कृतवर्मा मेरे रक्षक थे तो भी मैं इस दशाको आ पहुँचा। निश्चय ही कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ।।
एकादशचमूर्भर्ता सोऽहमेतां दशां गतः ।। ९ ।। कालं प्राप्य महाबाहो न कश्चिदतिवर्तते । ‘महाबाहो! मैं एक दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था; परंतु आज इस दशामें आ पड़ा हूँ। वास्तवमें कालको पाकर कोई उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ।। ९ १/२ ।।
आख्यातव्यं मदीयानां येऽस्मिन् जीवन्ति संयुगे ।। १० ।। यथाहं भीमसेनेन व्युत्क्रम्य समयं हतः । ‘मेरे पक्षके वीरोंमेंसे जो लोग इस युद्धमें जीवित बच गये हों, उन्हें यह बताना कि भीमसेनने किस तरह गदायुद्धके नियमका उल्लंघन करके मुझे मारा ।। १० १/२ ।।
बहूनि सुनृशंसानि कृतानि खलु पाण्डवैः ।। ११ ।। भूरिश्रवसि कर्णे च भीष्मे द्रोणे च श्रीमति । ‘पाण्डवोंने भूरिश्रवा, कर्ण, भीष्म तथा श्रीमान् द्रोणाचार्यके प्रति बहुत-से नृशंस कार्य किये हैं ।। ११ १/२ ।।
इदं चाकीर्तिजं कर्म नृशंसैः पाण्डवैः कृतम् ।। १२ ।। येन ते सत्सु निर्वेदं गमिष्यन्ति हि मे मतिः । ‘उन क्रूरकर्मा पाण्डवोंने यह भी अपनी अकीर्ति फैलानेवाला कर्म ही किया है, जिससे वे साधु पुरुषोंकी सभामें पश्चात्ताप करेंगे; ऐसा मेरा विश्वास है ।। १२ १/२ ।।
का प्रीतिः सत्त्वयुक्तस्य कृत्वोपधिकृतं जयम् ।। १३ ।। को वा समयभेत्तारं बुधः सम्मन्तुमर्हति । ‘छलसे विजय पाकर किसी सत्त्वगुणी या शक्तिशाली पुरुषको क्या प्रसन्नता होगी? अथवा जो युद्धके नियमको भंग कर देता है, उसका सम्मान कौन विद्वान् कर सकता है? ।। १३ १/२ ।।
अधर्मेण जयं लब्ध्वा को नु हृष्येत पण्डितः ।। १४ ।। यथा संहृष्यते पापः पाण्डुपुत्रो वृकोदरः ।