भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2976

सकता ॥ ९ ॥ अद्रिसारमयं नूनं हृदयं मम संजय । हतं पुत्रशतं श्रुत्वा यन्न दीर्णं सहस्रधा ॥ १० ॥ संजय! निश्चय ही मेरा हृदय पत्थरके सारतत्त्वका बना हुआ है, जो अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेका समाचार सुनकर भी इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो गये ॥ १० ॥ कथं हि वृद्धमिथुनं हतपुत्रं भविष्यति । न ह्यहं पाण्डवेयस्य विषये वस्तुमुत्सहे ॥ ११ ॥ हाय! अब हम दोनों बूढ़े पति-पत्नी अपने पुत्रोंके मारे जानेसे कैसे जीवित रहेंगे? मैं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके राज्यमें नहीं रह सकता ॥ ११ ॥ कथं राज्ञः पिता भूत्वा स्वयं राजा च संजय । प्रेष्यभूतः प्रवर्तेयं पाण्डवेयस्य शासनात् ॥ १२ ॥ संजय! मैं राजाका पिता और स्वयं भी राजा ही था। अब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी आज्ञाके अधीन हो दासकी भाँति कैसे जीवननिर्वाह करूँगा? ॥ १२ ॥ आज्ञाप्य पृथिवीं सर्वां स्थित्वा मूर्ध्नि च संजय । कथमद्य भविष्यामि प्रेष्यभूतो दुरन्तकृत् ॥ १३ ॥ संजय! पहले समस्त भूमण्डलपर मेरी आज्ञा चलती थी और मैं सबका शिरमौर था; ऐसा होकर अब मैं दूसरोंका दास बनकर कैसे रहूँगा। मैंने स्वयं ही अपने जीवनकी अन्तिम अवस्थाको दुःखमय बना दिया है! ॥ कथं भीमस्य वाक्यानि श्रोतुं शक्ष्यामि संजय । येन पुत्रशतं पूर्णमेकेन निहतं मम ॥ १४ ॥ ओह! जिसने अकेले ही मेरे पूरे-के-पूरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला, उस भीमसेनकी बातोंको मैं कैसे सुन सकूँगा? ॥ १४ ॥ कृतं सत्यं वचस्तस्य विदुरस्य महात्मनः । अकुर्वता वचस्तेन मम पुत्रेण संजय ॥ १५ ॥ संजय! मेरे पुत्रने मेरी बात न मानकर महात्मा विदुरके कहे हुए वचनको सत्य कर दिखाया ॥ १५ ॥ अधर्मेण हते तात पुत्रे दुर्योधने मम । कृतवर्मा कृपो द्रौणिः किमकुर्वत संजय ॥ १६ ॥ तात संजय! अब यह बताओ कि मेरे पुत्र दुर्योधनके अधर्मपूर्वक मारे जानेपर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामाने क्या किया? ॥ १६ ॥

संजय उवाच

गत्वा तु तावका राजन् नातिदूरमवस्थिताः ।