महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2988, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह भलीभाँति चेष्टा उसीकी मानी जाती है जो बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करता है, उनसे अपने कल्याणकी बात पूछता है और उनके बताये हुए हितकारक वचनोंका पालन करता है॥ २१ १/२ ॥ उत्थायोत्थाय हि सदा प्रष्टव्या वृद्धसम्मताः ॥ २२ ॥ ते स्म योगे परं मूलं तन्मूला सिद्धिरुच्यते । प्रतिदिन सबेरे उठ-उठकर वृद्धजनोंद्वारा सम्मानित पुरुषोंसे अपने हितकी बात पूछनी चाहिये; क्योंकि वे अप्राप्तकी प्राप्ति करानेवाले उपायके मुख्य हेतु हैं। उनका बताया हुआ वह उपाय ही सिद्धिका मूल कारण कहा जाता है ॥ २२ १/२ ॥ वृद्धानां वचनं श्रुत्वा योऽभ्युत्थानं प्रयोजयेत् ॥ २३ ॥ उत्थानस्य फलं सम्यक् तदा स लभतेऽचिरात् । जो वृद्ध पुरुषोंका वचन सुनकर उसके अनुसार कार्य आरम्भ करता है, वह उस कार्यका उत्तम फल शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है ॥ २३ १/२ ॥ रागात् क्रोधाद् भयाल्लोभाद् योऽर्थानीहति मानवः ॥ २४ ॥ अनीशश्चावमानी च स शीघ्रं भ्रश्यते श्रियः । अपने मनको वशमें न रखते हुए दूसरोंकी अवहेलना करनेवाला जो मानव राग, क्रोध, भय और लोभसे किसी कार्यकी सिद्धिके लिये चेष्टा करता है, वह बहुत जल्दी अपने ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ २४ १/२ ॥ सोऽयं दुर्योधनेनार्थो लुब्धेनादीर्घदर्शिना ॥ २५ ॥ असमर्थ्य समारब्धो मूढत्वादविचिन्तितः । हितबुद्धीननादृत्य सम्मन्त्र्यासाधुभिः सह ॥ २६ ॥ वार्यमाणोऽकरोद् वैरं पाण्डवैर्गुणवत्तरैः । दुर्योधन लोभी और अदूरदर्शी था। उसने मूर्खतावश न तो किसीका समर्थन प्राप्त किया और न स्वयं ही अधिक सोच-विचार किया। उसने अपना हित चाहनेवाले लोगोंका अनादर करके दुष्टोंके साथ सलाह की और सबके मना करनेपर भी अधिक गुणवान् पाण्डवोंके साथ वैर बाँध लिया ॥ २५-२६ १/२ ॥ पूर्वमप्यतिदुःशीलो न धैर्यं कर्तुमर्हति ॥ २७ ॥ तपत्यर्थे विपन्ने हि मित्राणां न कृतं वचः । पहले भी वह बड़े दुष्ट स्वभावका था। धैर्य रखना तो वह जानता ही नहीं था। उसने मित्रोंकी बात नहीं मानी; इसलिये अब काम बिगड़ जानेपर पश्चात्ताप करता है ॥ अनुवर्तामहे यत्तु तं वयं पापपूरुषम् ॥ २८ ॥ अस्मानप्यनयस्तस्मात् प्राप्तोऽयं दारुणो महान् ।