महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2998, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंन हि त्वां रथिनां श्रेष्ठं प्रगृहीतवरायुधम् ।
जेतुमुत्सहते शश्वदपि देवेषु वासवः ॥ ७ ॥
तुम रथियोंमें श्रेष्ठ हो, तुमने अपने हाथमें उत्तम आयुध ले रखा है। तुम्हें देवताओंके राजा इन्द्र भी कभी जीतनेका साहस नहीं कर सकते हैं ॥ ७ ॥
कृपेण सहितं यान्तं गुप्तं च कृतवर्मणा ।
को द्रौणिं युधि संरब्धं योधयेदपि देवराट् ॥ ८ ॥
जब कृतवर्मासे सुरक्षित हो द्रोणपुत्र अश्वत्थामा मुझ कृपाचार्यके साथ कुपित होकर युद्धके लिये प्रस्थान करेगा, उस समय कौन वीर, वह देवराज इन्द्र ही क्यों न हो, उसका सामना कर सकता है? ॥ ८ ॥
ते वयं निशि विश्रान्ता विनिद्रा विगतज्वराः ।
प्रभातायां रजन्यां वै निहनिष्याम शात्रवान् ॥ ९ ॥
अतः हमलोग रातमें विश्राम करके निद्रारहित और विगतज्वर हो प्रातःकाल अपने शत्रुओंका संहार करेंगे ॥ ९ ॥
तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि मम चैव न संशयः ।
सात्वतोऽपि महेष्वासो नित्यं युद्धेषु कोविदः ॥ १० ॥
इसमें संशय नहीं कि तुम्हारे और मेरे पास भी दिव्यास्त्र हैं तथा महाधनुर्धर कृतवर्मा भी युद्ध करनेकी कलामें सदा ही कुशल हैं ॥ १० ॥
ते वयं सहितास्तात सर्वान् शत्रून् समागतान् ।
प्रसह्य समरे हत्वा प्रीतिं प्राप्स्याम पुष्कलाम् ॥ ११ ॥
तात! हम सब लोग एक साथ होकर समरांगणमें सामने आये हुए समस्त शत्रुओंका संहार करके अत्यन्त हर्षका अनुभव करेंगे ॥ ११ ॥
विश्रमस्व त्वमव्यग्रः स्वप चेमां निशां सुखम् ।
अहं च कृतवर्मा च त्वां प्रयान्तं नरोत्तमम् ॥ १२ ॥
अनुयास्याव सहितौ धन्विनौ परतापनौ ।
रथिनं त्वरया यान्तं रथमास्थाय दंशितौ ॥ १३ ॥
तुम व्यग्रता छोड़कर विश्राम करो और इस रातमें सुखपूर्वक सो लो। कल सबेरे युद्धके लिये प्रस्थान करते समय तुम-जैसे नरश्रेष्ठ वीरके पीछे शत्रुओंको संताप देनेवाले हम और कृतवर्मा धनुष लेकर एक साथ चलेंगे। बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ते हुए रथी अश्वत्थामाके साथ हम दोनों भी कवच धारण करके रथपर आरूढ़ हो यात्रा करेंगे ॥ १२-१३ ॥
स गत्वा शिविरं तेषां नाम विश्राव्य चाहवे ।
ततः कर्तासि शत्रूणां युध्यतां कदनं महत् ॥ १४ ॥