भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 3019

साक्षात् भगवान् शंकर भी प्रतिदिन उनके कर्मोंको देखकर आश्चर्यचकित हो जाते थे। वे मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा सदा सावधान रहकर महादेवजीकी आराधना करते थे॥ ४३॥
मनोवाक्कर्मभिर्भक्तान् पाति पुत्रानिवौरसान्।
पिबन्तोऽसृग्वसाश्चान्ये क्रुद्धा ब्रह्मद्विषां सदा ॥ ४४ ॥
मन, वाणी और कर्मसे अपने प्रति भक्ति रखनेवाले उन भक्तोंका भगवान् शिव सदा औरस पुत्रोंकी भाँति पालन करते थे। बहुत-से पार्षद रक्त और वसा पीकर रहते थे। वे ब्रह्मद्रोहियोंपर सदा क्रोध प्रकट करते थे॥ ४४॥
चतुर्विधात्मकं सोमं ये पिबन्ति च सर्वदा ।
श्रुतेन ब्रह्मचर्येण तपसा च दमेन च ॥ ४५ ॥
ये समाराध्य शूलाङ्कं भवसायुज्यमागताः ।
अन्न, सोमलताका रस, अमृत और चन्द्रमण्डल—ये चार प्रकारके सोम हैं, वे पार्षदगण इनका सदा पान करते हैं। उन्होंने वेदोंके स्वाध्याय, ब्रह्मचर्यपालन, तपस्या और इन्द्रिय-संयमके द्वारा त्रिशूल-चिह्नित भगवान् शिवकी आराधना करके उनका सायुज्य प्राप्त कर लिया है॥ ४५ १/२ ॥
यैरात्मभूतैर्भगवान् पार्वत्या च महेश्वरः ॥ ४६ ॥
महाभूतगणैर्भुङ्क्ते भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
वे महाभूतगण भगवान् शिवके आत्मस्वरूप हैं, उनके तथा पार्वतीदेवीके साथ भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी महेश्वर यज्ञ-भाग ग्रहण करते हैं॥
नानावादित्रहसितश्वेडितोत्कृष्टगर्जितैः ॥ ४७ ॥
संत्रासयन्तस्ते विश्वमश्वत्थामानमभ्ययुः ।
भगवान् शिवके वे पार्षद नाना प्रकारके बाजे बजाने, हँसने, सिंहनाद करने, ललकारने तथा गर्जने आदिके द्वारा सम्पूर्ण विश्वको भयभीत करते हुए अश्वत्थामाके पास आये ॥ ४७ १/२ ॥
संस्तुवन्तो महादेवं भाः कुर्वाणाः सुवर्चसः ॥ ४८ ॥
विवर्धयिषवो द्रौणेर्महिमानं महात्मनः ।
जिज्ञासमानास्तेजः सौप्तिकं च दिदृक्षवः ॥ ४९ ॥
भीमोग्रपरिघालातशूलपट्टिशपाणयः ।
घोररूपाः समाजग्मुर्भूतसङ्घाः समन्ततः ॥ ५० ॥
भूतोंके वे समूह बड़े भयंकर और तेजस्वी थे तथा सब ओर अपनी प्रभा फैला रहे थे। अश्वत्थामामें कितना तेज है, इस बातको वे जानना चाहते थे और सोते समय जो महान् संहार होनेवाला था, उसे भी देखनेकी इच्छा रखते थे। साथ ही महामनस्वी द्रोणकुमारकी महिमा बढ़ाना चाहते थे; इसीलिये महादेवजीकी स्तुति करते हुए वे चारों ओरसे वहाँ आ