महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3025, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं शयानं महात्मानं विश्रब्धमकुतोभयम् ।। १४ ।।
प्राबोधयत पादेन शयनस्थं महीपते ।
भूपाल! अश्वत्थामाने निश्चिन्त एवं निर्भय होकर शय्यापर सोये हुए महामनस्वी धृष्टद्युम्नको पैरसे ठोकर मारकर जगाया ।। १४ ½ ।।
सम्बुध्य चरणस्पर्शादुत्थाय रणदुर्मदः ।। १५ ।।
अभ्यजानादमेयात्मा द्रोणपुत्रं महारथम् ।
अमेय आत्मबलसे सम्पन्न रणदुर्मद धृष्टद्युम्न उसके पैर लगते ही जाग उठा और जागते ही उसने महारथी द्रोणपुत्रको पहचान लिया ।। १५ ½ ।।
तमुत्पतन्तं शयनादश्वत्थामा महाबलः ।। १६ ।।
केशेष्वालभ्य पाणिभ्यां निष्पिपेप महीतले ।
अब वह शय्यासे उठनेकी चेष्टा करने लगा। इतनेहीमें महाबली अश्वत्थामाने दोनों हाथसे उसके बाल पकड़कर पृथ्वीपर पटक दिया और वहाँ अच्छी तरह रगड़ा ।। १६ ½ ।।
सबलं तेन निष्पिष्टः साध्वसेन च भारत ।। १७ ।।
निद्रया चैव पाञ्चाल्यो नाशकच्चेष्टितुं तदा ।
भारत! धृष्टद्युम्न भय और निद्रासे दबा हुआ था। उस अवस्थामें जब अश्वत्थामाने उसे जोरसे पटककर रगड़ना आरम्भ किया, तब उससे कोई भी चेष्टा करते न बना ।। १७ ½ ।।
तमाक्रम्य पदा राजन् कण्ठे चोरसि चोभयोः ।। १८ ।।
नदन्तं विस्फुरन्तं च पशुमारममारयत् ।
राजन्! उसने पैरसे उसकी छाती और गला दोनोंको दबा दिया और उसे पशुकी तरह मारना आरम्भ किया। वह बेचारा चीखता और छटपटाता रह गया ।। १८ ½ ।।
तुदन्नखैस्तु स द्रौणिं नातिव्यक्तमुदाहरत् ।। १९ ।।
आचार्यपुत्र शस्त्रेण जहि मां मा चिरं कृथाः ।
त्वत्कृते सुकृताँल्लोकान् गच्छेयं द्विपदां वर ।। २० ।।
उसने अपने नखोंसे द्रोणकुमारको बकोटते हुए अस्पष्ट वाणीमें कहा—'मनुष्योंमें श्रेष्ठ आचार्यपुत्र! अब देरी न करो। मुझे किसी शस्त्रसे मार डालो, जिससे तुम्हारे कारण मैं पुण्यलोकोंमें जा सकूँ' ।। १९-२० ।।
एवमुक्त्वा तु वचनं विरराम परंतपः ।
सुतः पाञ्चालराजस्य आक्रान्तो बलिना भृशम् ।। २१ ।।
ऐसा कहकर बलवान् शत्रुके द्वारा बड़े जोरसे दबाया हुआ शत्रुसंतापी पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न चुप हो गया ।। २१ ।।
तस्याव्यक्तां तु तां वाचं संश्रुत्य द्रौणिरब्रवीत् ।
आचार्यघातिनां लोका न सन्ति कुलपांसन ।। २२ ।।