भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 3029

ये त्वजाग्रन्त कौरव्य तेऽपि शब्देन मोहिताः । निरीक्ष्यमाणा अन्योन्यं दृष्ट्वा दृष्ट्वा प्रविव्यथुः ॥ ४५ ॥ कुरुनन्दन! जो जाग रहे थे, वे भी उस कोलाहलसे किंकर्तव्यविमूढ हो गये थे। परस्पर देखे जाते हुए वे सभी सैनिक अश्वत्थामाको देख-देखकर व्यथित हो रहे थे ॥ ४५ ॥

तद् रूपं तस्य ते दृष्ट्वा क्षत्रियाः शत्रुकर्षणः । राक्षसं मन्यमानास्तं नयनानि न्यमीलयन् ॥ ४६ ॥ वे शत्रुसूदन क्षत्रिय अश्वत्थामाका वह रूप देख उसे राक्षस समझकर आँखें मूँद लेते थे ॥ ४६ ॥

स घोररूपो व्यचरत् कालवच्छिविरे ततः । अपश्यद् द्रौपदीपुत्रानवशिष्टांश्च सोमकान् ॥ ४७ ॥ वह भयानक रूपधारी द्रोणकुमार सारे शिविरमें कालके समान विचरने लगा। उसने द्रौपदीके पाँचों पुत्रों और मरनेसे बचे हुए सोमकोंको देखा ॥ ४७ ॥

तेन शब्देन वित्रस्ता धनुर्हस्ता महारथाः । धृष्टद्युम्नं हतं श्रुत्वा द्रौपदेया विशाम्पते ॥ ४८ ॥ प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नको मारा गया सुनकर द्रौपदीके पाँचों महारथी पुत्र उस शब्दसे भयभीत हो हाथमें धनुष लिये आगे बढ़े ॥ ४८ ॥

अवाकिरन् शरव्रातैर्भारद्वाजमभीतवत् । ततस्तेन निनादेन सम्प्रबुद्धाः प्रभद्रकाः ॥ ४९ ॥ शिलीमुखैः शिखण्डी च द्रोणपुत्रं समार्दयन् । उन्होंने निर्भय-से होकर अश्वत्थामापर बाण-समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। तदनन्तर वह कोलाहल सुनकर वीर प्रभद्रकगण जाग उठे। शिखण्डी भी उनके साथ हो लिया। उन सबने द्रोणपुत्रको पीड़ा देना आरम्भ किया ॥ ४९ १/२ ॥

भारद्वाजः स तान् दृष्ट्वा शरवर्षाणि वर्षतः ॥ ५० ॥ ननाद बलवन्नादं जिघांसुस्तान् महारथान् । उन महारथियोंको बाणोंकी वर्षा करते देख अश्वत्थामा उन्हें मार डालनेकी इच्छासे जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ५० १/२ ॥

ततः परमसंक्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् ॥ ५१ ॥ अवरुह्य रथोपस्थात् त्वरमाणोऽभिदुद्रुवे । सहस्रचन्द्रविमलं गृहीत्वा चर्म संयुगे ॥ ५२ ॥ खड्गं च विमलं दिव्यं जातरूपपरिष्कृतम् । तदनन्तर पिताके वधका स्मरण करके वह अत्यन्त कुपित हो उठा और रथकी बैठकसे उतरकर सहस्रों चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त चमकीली ढाल और सुवर्णभूषित दिव्य एवं निर्मल खड्ग लेकर युद्धमें बड़ी उतावलीके साथ उनकी ओर दौड़ा ॥ ५१-५२ १/२ ॥