महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3032, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनरांश्चकुञ्जरान् पाशैर्बद्ध्वा घोरैः प्रतस्थुषीम् ॥ ७० ॥ उस समय पाण्डवपक्षके योद्धाओंने मूर्तिमती कालरात्रिको देखा, जिसके शरीरका रंग काला था, मुख और नेत्र लाल थे। वह लाल फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये हुए थी। उसने लाल रंगकी ही साड़ी पहन रखी थी। वह अपने ढंगकी अकेली थी और हाथमें पाश लिये हुए थी। उसकी सखियोंका समुदाय भी उसके साथ था। वह गीत गाती हुई खड़ी थी और भयंकर पाशोंद्वारा मनुष्यों, घोड़ों एवं हाथियोंको बाँधकर लिये जाती थी ॥ ६९-७० ॥
वहन्तीं विविधान् प्रेतान् पाशबद्धान् विमूर्धजान् । तथैव च सदा राजन् न्यस्तशस्त्रान् महारथान् ॥ ७१ ॥ स्वप्ने सुप्तान्रायन्तीं तां रात्रिष्वन्यासु मारिष । ददृशुर्योधमुख्यास्ते घ्नन्तं द्रौणिं च सर्वदा ॥ ७२ ॥ माननीय नरेश! मुख्य-मुख्य योद्धा अन्य रात्रियोंमें भी सपनेमें उस कालरात्रिको देखते थे। राजन्! वह सदा नाना प्रकारके केशरहित प्रेतोंको अपने पाशोंमें बाँधकर लिये जाती दिखायी देती थी, इसी प्रकार हथियार डालकर सोये हुए महारथियोंको भी लिये जाती हुई स्वप्नमें दृष्टिगोचर होती थी। वे योद्धा सबका संहार करते हुए द्रोणकुमारको भी सदा सपनोंमें देखा करते थे ॥ ७१-७२ ॥
यतः प्रभृति संग्रामः कुरुपाण्डवसेनयोः । ततः प्रभृति तां कन्यामपश्यन् द्रौणिमेव च ॥ ७३ ॥ तांस्तु दैवहतान् पूर्वं पश्चाद् द्रौणिर्व्यपातयत् । त्रासयन् सर्वभूतानि विनदन् भैरवान् रवान् ॥ ७४ ॥ जबसे कौरव-पाण्डव सेनाओंका संग्राम आरम्भ हुआ था, तभीसे वे योद्धा कन्यारूपिणी कालरात्रिको और कालरूपधारी अश्वत्थामाको भी देखा करते थे। पहलेसे ही दैवके मारे हुए उन वीरोंका द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने पीछे वध किया था। वह अश्वत्थामा भयानक स्वरसे गर्जना करके समस्त प्राणियोंको भयभीत कर रहा था ॥
तदनुस्मृत्य ते वीरा दर्शनं पूर्वकालिकम् । इदं तदित्यमन्यन्त दैवेनोपनिपीड़िताः ॥ ७५ ॥ वे दैवपीड़ित वीरगण पूर्वकालके देखे हुए सपनेको याद करके ऐसा मानने लगे कि 'यह वही स्वप्न इस रूपमें सत्य हो रहा है' ॥ ७५ ॥
ततस्तेन निनादेन प्रत्यबुध्यन्त धन्विनः । शिबिरे पाण्डवेयानां शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७६ ॥ तदनन्तर अश्वत्थामाके उस सिंहनादसे पाण्डवोंके शिविरमें सैकड़ों और हजारों धनुर्धर वीर जाग उठे ॥
सोऽच्छिनत् कस्यचित् पादौ जघनं चैव कस्यचित् ।