भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3034

अश्वत्थामा पुनः उछलने और अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले दूसरे-दूसरे नरश्रेष्ठ शूरवीरोंको दूरसे भी मारकर कालरात्रिके हवाले कर देता था ।। तथैव स्यन्दनाग्रेण प्रमथन् स विधावति । शरवर्षैश्च विविधैर्वर्षञ्छात्रांस्ततः ।। ८५ ।। वह अपने रथके अग्रभागसे शत्रुओंको कुचलता हुआ सब ओर दौड़ लगाता और नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षासे शत्रुसैनिकोंको घायल करता था ।। ८५ ।। पुनश्च सुविचित्रेण शतचन्द्रेण चर्मणा । तेन चाकाशवर्णेन तथाचरत सोऽसिना ।। ८६ ।। फिर वह सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त विचित्र ढाल और आकाशके रंगवाली चमचमाती तलवार लेकर सब ओर विचरने लगा ।। ८६ ।। तथा च शिबिरं तेषां द्रौणिराहवदुर्मदः । व्यक्षोभयत राजेन्द्र महाह्रदमिव द्विपः ।। ८७ ।। राजेन्द्र! रणदुर्मद द्रोणकुमारने उन शत्रुओंके शिविरको उसी प्रकार मथ डाला, जैसे कोई गजराज किसी विशाल सरोवरको विक्षुब्ध कर डालता है ।। ८७ ।। उत्पेतुस्तेन शब्देन योधा राजन् विचेतसः । निद्रार्ताश्च भयार्ताश्च व्यधावन्त ततस्ततः ।। ८८ ।। राजन्! उस मार-काटके कोलाहलसे निद्रामें अचेत पड़े हुए योद्धा चौंककर उछल पड़ते और भयसे व्याकुल हो इधर-उधर भागने लगते थे ।। ८८ ।। विस्वरं चुक्रुशुश्चान्ये बह्वबद्धं तथा वदन् । न च स्म प्रत्यपद्यन्त शस्त्राणि वसनानि च ।। ८९ ।। कितने ही योद्धा गला फाड़-फाड़कर चिल्लाते और बहुत-सी ऊटपटाँग बातें बकने लगते थे। वे अपने अस्त्र-शस्त्र तथा वस्त्रोंको भी नहीं ढूँढ़ पाते थे ।। ८९ ।। विमुक्तकेशाश्चाप्यन्ये नाभ्यजानन् परस्परम् । उत्पतन्तोऽपतन् श्रान्ताः केचित् तत्राभ्रमंस्तदा ।। ९० ।। दूसरे बहुत-से योद्धा बाल बिखेरे हुए भागते थे। उस दशामें वे एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। कोई उछलते हुए भागते और थककर गिर जाते थे तथा कोई उसी स्थानपर चक्कर काटते रहते थे ।। ९० ।। पुरीषमसृजन् केचित् केचिन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः । बन्धनानि च राजेन्द्र संच्छिद्य तुरगा द्विपाः ।। ९१ ।। समं पर्यपतंश्चान्ये कुर्वन्तो महदाकुलम् । कितने ही मलत्याग करने लगे। कितनोंके पेशाब झड़ने लगे। राजेन्द्र! दूसरे बहुत-से घोड़े और हाथी बन्धन तोड़कर एक साथ ही सब ओर दौड़ने और लोगोंको अत्यन्त व्याकुल करने लगे ।। ९१ १/२ ।।