महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3073, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअशोभेतां महात्मानौ दाशार्हमभितः स्थितौ । रथस्थं शार्ङ्गधन्वानमश्विनाविव वासवम् ॥ ७ ॥ वे दोनों महात्मा पाण्डव रथपर स्थित हुए शार्ङ्ग धनुषधारी दाशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णके समीप विराजमान हो इन्द्रके पास बैठे हुए दोनों अश्विनीकुमारोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ७ ॥
तावुपारोप्य दाशार्हः स्यन्दनं लोकपूजितम् । प्रतोदेन जवोपेतान् परमाश्वानचोदयत् ॥ ८ ॥ उन दोनों भाइयोंको उस लोकपूजित रथपर चढ़ाकर दशार्हवंशी श्रीकृष्णने वेगशाली उत्तम अश्वोंको चाबुकसे हाँका ॥ ८ ॥
ते हयाः सहसोत्पेतुरृहीत्वा स्यन्दनोत्तमम् । आस्थितं पाण्डवेयाभ्यां यदूनामृषभेण च ॥ ९ ॥ वे घोड़े दोनों पाण्डवों तथा यदुकुलतिलक श्रीकृष्णकी सवारीमें आये हुए उस उत्तम रथको लेकर सहसा उड़ चले ॥ ९ ॥
वहतां शार्ङ्गधन्वानमश्वानां शीघ्रगामिनाम् । प्रादुरासीन्महान् शब्दः पक्षिणां पततामिव ॥ १० ॥ शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णकी सवारी ढोते हुए उन शीघ्रगामी अश्वोंका महान् शब्द उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रकट हो रहा था ॥ १० ॥
ते समाच्छन्नरव्याघ्राः क्षणेन भरतर्षभ । भीमसेनं महेष्वासं समनुद्रुत्य वेगिताः ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! वे तीनों नरश्रेष्ठ बड़े वेगसे पीछे-पीछे दौड़कर क्षणभरमें महाधनुर्धर भीमसेनके पास जा पहुँचे ॥ ११ ॥
क्रोधदीप्तं तु कौन्तेयं द्विषदर्थे समुद्यतम् । नाशक्नुवन् वारयितुं समेत्यापि महारथाः ॥ १२ ॥ इस समय कुन्तीकुमार भीमसेन क्रोधसे प्रज्वलित हो शत्रुके संहार करनेके लिये तुले हुए थे। इसलिये वे तीनों महारथी उनसे मिलकर भी उन्हें रोक न सके ॥ १२ ॥
स तेषां प्रेक्षतामेव श्रीमतां दृढधन्विनाम् । ययौ भागीरथीतीरं हरिभिर्भृशवेगितैः ॥ १३ ॥ यत्र स्म श्रूयते द्रौणिः पुत्रहन्ता महात्मनाम् । उन सुदृढ़ धनुर्धर तेजस्वी वीरोंके देखते-देखते वे अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंके द्वारा भागीरथीके तटपर जा पहुँचे, जहाँ उन महात्मा पाण्डवोंके पुत्रोंका वध करनेवाला अश्वत्थामा बैठा सुना गया था ॥ १३ ½ ॥
स ददर्श महात्मानमुदकान्ते यशस्विनम् ॥ १४ ॥ कृष्णद्वैपायनं व्यासमासीनमृषिभिः सह ।