महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3084, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभ्रातृबन्धोः कस्मात् त्वं वधमस्य चिकीर्षसि ॥ २२ ॥ ये ऐसे धैर्यवान्, साधु, सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता तथा सत्पुरुष हैं, तथापि तुम भाई-बन्धुओंसहित इनका वध करनेकी इच्छा क्यों रखते हो? ॥ २२ ॥ अस्त्रं ब्रह्मशिरो यत्र परमास्त्रेण वध्यते । समा द्वादश पर्जन्यस्तद्राष्ट्रं नाभिवर्षति ॥ २३ ॥ जिस देशमें एक ब्रह्मास्त्रको दूसरे उत्कृष्ट अस्त्रसे दबा दिया जाता है, उस राष्ट्रमें बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं होती है ॥ एतदर्थं महाबाहुः शक्तिमानपि पाण्डवः । न विहन्त्येतदस्त्रं तु प्रजाहितचिकीर्षया ॥ २४ ॥ इसीलिये प्रजावर्गके हितकी इच्छासे महाबाहु अर्जुन शक्तिशाली होते हुए भी तुम्हारे इस अस्त्रको नष्ट नहीं कर रहे हैं ॥ २४ ॥ पाण्डवास्त्वं च राष्ट्रं च सदा संरक्ष्यमेव हि । तस्मात् संहर दिव्यं त्वमस्त्रमेतन्महाभुज ॥ २५ ॥ महाबाहो! तुम्हें पाण्डवोंकी, अपनी और इस राष्ट्रकी भी सदा रक्षा ही करनी चाहिये; इसलिये तुम अपने इस दिव्यास्त्रको लौटा लो ॥ २५ ॥ अरोषस्तव चैवास्तु पार्थाः सन्तु निरामयाः । न ह्यधर्मेण राजर्षिः पाण्डवो जेतुमिच्छति ॥ २६ ॥ तुम्हारा रोष शान्त हो और पाण्डव भी स्वस्थ रहें। पाण्डुपुत्र राजर्षि युधिष्ठिर किसीको भी अधर्मसे नहीं जीतना चाहते हैं ॥ २६ ॥ मणिं चैव प्रयच्छाद्य यस्ते शिरसि तिष्ठति । एतदादाय ते प्राणान् प्रतिदास्यन्ति पाण्डवाः ॥ २७ ॥ तुम्हारे सिरमें जो मणि है, इसे आज इन्हें दे दो। इस मणिको ही लेकर पाण्डव बदलेमें तुम्हें प्राणदान देंगे ॥ २७ ॥
द्रौणिरुवाच
पाण्डवैर्यानि रत्नानि यच्चान्यत् कौरवैर्धनम् । अवाप्तमिह तेभ्योऽयं मणिर्मम विशिष्यते ॥ २८ ॥ **अश्वत्थामा बोला—**पाण्डवोंने अबतक जो-जो रत्न प्राप्त किये हैं तथा कौरवोंने भी यहाँ जो धन पाया है, मेरी यह मणि उन सबसे अधिक मूल्यवान् है ॥ २८ ॥ यमाबध्य भयं नास्ति शस्त्रव्याधिक्षुधाश्रयम् । देवेभ्यो दानवेभ्यो वा नागेभ्यो वा कथंचन ॥ २९ ॥ इसे बाँध लेनेपर शस्त्र, व्याधि, क्षुधा, देवता, दानव अथवा नाग किसीसे भी किसी तरहका भय नहीं रहता ॥