महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3089, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रोणपुत्रस्य सहजं मणिमादाय सत्वराः । द्रौपदीमभ्यधावन्त प्रायोपेतां मनस्विनीम् ॥ २२ ॥ इधर जिनके शत्रु मारे गये थे, वे पाण्डव भी भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास तथा महामुनि नारदजीको आगे करके द्रोणपुत्रके साथ ही उत्पन्न हुई मणि लिये आमरण अनशनका निश्चय किये बैठी हुई मनस्विनी द्रौपदीके पास पहुँचनेके लिये शीघ्रतापूर्वक चले ॥ २१-२२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते पुरुषव्याघ्राः सदश्वैरनिलोपमैः । अभ्ययुः सहदाशार्हाः शिविरं पुनरेव हि ॥ २३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण-सहित वे पुरुषसिंह पाण्डव वहाँसे वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंद्वारा पुनः अपने शिविरमें आ पहुँचे ॥ २३ ॥ अवतीर्य रथेभ्यस्तु त्वरमाणा महारथाः । ददृशुर्द्रौपदीं कृष्णामार्तामार्ततराः स्वयंम् ॥ २४ ॥ वहाँ रथोंसे उतरकर वे महारथी वीर बड़ी उतावलीके साथ आकर शोकपीड़ित द्रुपदकुमारी कृष्णासे मिले। वे स्वयं भी शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे ॥ तामुपेत्य निरानन्दां दुःखशोकसमन्विताम् । परिवार्य व्यतिष्ठन्त पाण्डवाः सहकेशवाः ॥ २५ ॥ दुःख-शोकमें डूबी हुई आनन्दशून्य द्रौपदीके पास पहुँचकर श्रीकृष्णसहित पाण्डव उसे चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ २५ ॥ ततो राजाभ्यनुज्ञातो भीमसेनो महाबलः । प्रददौ तं मणिं दिव्यं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २६ ॥ तब राजाकी आज्ञा पाकर महाबली भीमसेनने वह दिव्य मणि द्रौपदीके हाथमें दे दी और इस प्रकार कहा— ॥ अयं भद्रे तव मणिः पुत्रहन्तुर्जितः स ते । उत्तिष्ठ शोकमत्सृज्य क्षात्रधर्ममनुस्मर ॥ २७ ॥ ‘भद्रे! यह तुम्हारे पुत्रोंका वध करनेवाले अश्वत्थामा-की मणि है। तुम्हारे उस शत्रुको हमने जीत लिया। अब शोक छोड़कर उठो और क्षत्रियधर्मका स्मरण करो ॥ २७ ॥ प्रयाणे वासुदेवस्य शमार्थमसितेक्षणे । यान्युक्तानि त्वया भीरु वाक्यानि मधुघातिनि ॥ २८ ॥ ‘कजरारे नेत्रोंवाली भोली-भाली कृष्णे! जब मधुसूदन श्रीकृष्ण कौरवोंके पास संधि करानेके लिये जा रहे थे, उस समय तुमने इनसे जो बातें कही थीं, उन्हें याद तो करो ॥ नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा भ्रातरो न च ।