भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 309

तब शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले अर्जुनकुमारने अपने सायकोंद्वारा शल्यके भाईके मस्तक, ग्रीवा, हाथ, पैर, धनुष, अश्व, छत्र, ध्वज, सारथि, त्रिवेणु, तल्प (शय्या), पहिये, जूआ, तरकश, अनुकर्ष, पताका, चक्ररक्षक तथा अन्य समस्त उपकरणोंको काट डाला। उस समय कोई भी उसे देख न सका। जैसे वायुके वेगसे कोई महान् पर्वत टूटकर गिर पड़े, उसी प्रकार अमिततेजस्वी अभिमन्युका मारा हुआ वह शल्यराजका भाई छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके वस्त्र और आभूषणोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे॥ ५—७ १/२ ॥

अनुगास्तस्य वित्रस्ताः प्राद्रवन् सर्वतो दिशः ॥ ८ ॥
आर्जुनेः कर्म तद् दृष्ट्वा सम्प्रणेदुः समन्ततः ।
नादेन सर्वभूतानि साधु साध्विति भारत ॥ ९ ॥

उसके सेवक भयभीत होकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये। भारत! अर्जुनकुमारके उस अद्भुत पराक्रमको देखकर समस्त प्राणी साधुवाद देते हुए सब ओर हर्षध्वनि करने लगे॥ ८-९॥

शल्यभ्रातर्यथारुग्णे बहुशस्तस्य सैनिकाः ।
कुलाधिवासनामानि श्रावयन्तोऽर्जुनात्मजम् ॥ १० ॥
अभ्यधावन्त संक्रुद्धा विविधा smash विविधायुधपाणयः ।

शल्यके भाईके मारे जानेपर उसके बहुत-से सैनिक अपने कुल और निवासस्थानके नाम सुनाते हुए कुपित हो हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये अर्जुनकुमार अभिमन्युकी ओर दौड़े॥ १० १/२ ॥

रथैरश्वैर्गजैश्चान्ये पद्भिश्चान्ये बलोत्कटाः ॥ ११ ॥
बाणशब्देन महता रथनेमिस्वनेन च ।
हुंकारैः क्ष्वेडितोत्कृष्टैः सिंहनादैः सगर्जितैः ॥ १२ ॥
ज्यातलत्रस्वनैरन्ये गर्जन्तोऽर्जुननन्दनम् ।
ब्रुवन्तश्च न नो जीवन् मोक्ष्यसे जीवितादिति ॥ १३ ॥

कितने ही वीर रथ, घोड़े और हाथीपर सवार होकर आये। दूसरे बहुत-से प्रचण्ड बलशाली योद्धा पैदल ही दौड़ पड़े। बाणोंकी सनसनाहट, रथके पहियोंकी जोर-जोरसे होनेवाली घर्घरहाट, हुंकार, कोलाहल, ललकार, सिंहनाद, गर्जना, धनुषकी टंकार तथा हस्तत्राणके चट-चट शब्दके साथ गर्जन-तर्जन करते हुए अन्यान्य बहुत-से योद्धा अर्जुनकुमार अभिमन्युपर यह कहते हुए टूट पड़े, ‘अब तू हमारे हाथसे जीवित नहीं छूट सकता। तुझे जीवनसे ही हाथ धोना पड़ेगा’ ॥ ११—१३ ॥

तांस्तथा ब्रुवतो दृष्ट्वा सौभद्रः प्रहसन्निव ।
यो योऽस्मै प्राहरत् पूर्वं तं तं विव्याध पत्रिभिः ॥ १४ ॥

उनको ऐसा कहते देख सुभद्राकुमार अभिमन्यु मानो जोर-जोरसे हँसने लगा और जिस-जिस योद्धाने उसपर पहले प्रहार किया, उस-उसको उसने भी अपने पंखयुक्त