महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर यह सारा जगत् पुनः सुस्थिर हो गया। देवताओंने सारे हविष्यो॑मेंसे महादेवजीके लिये भाग नियत किया॥ २३॥
तस्मिन् क्रुद्धेऽभवत् सर्वमसुस्थं भुवनं प्रभो।
प्रसन्ने च पुनः सुस्थं प्रसन्नोऽस्य च वीर्यवान्॥ २४॥
राजन्! भगवान् शंकरके कुपित होनेपर सारा जगत् डाँवाडोल हो गया था और उनके प्रसन्न होनेपर वह पुनः सुस्थिर हो गया। वे ही शक्तिशाली भगवान् शिव अश्वत्थामापर प्रसन्न हो गये थे॥ २४॥
ततस्ते निहताः सर्वे तव पुत्रा महारथाः।
अन्ये च बहवः शूराः पाञ्चालस्य पदानुगाः॥ २५॥
इसीलिये उसने आपके सभी महारथी पुत्रों तथा पांचालराजका अनुसरण करनेवाले अन्य बहुत-से शूरवीरोंका वध किया है॥ २५॥
न तन्मनसि कर्तव्यं न च तद् द्रौणिना कृतम्।
महादेवप्रसादेन कुरु कार्यमनन्तरम्॥ २६॥
अतः इस बातको आप मनमें न लावें। अश्वत्थामाने यह कार्य अपने बलसे नहीं, महादेवजीकी कृपासे सम्पन्न किया है। अब आप आगे जो कुछ करना हो, वही कीजिये॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८॥
॥ सौप्तिकपर्व सम्पूर्णम् ॥
| अनुष्टुप् | बड़े श्लोक | बड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपर | कुल | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये | ७९०॥ | (१४) | १९। | ८०९॥। |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये | १ | ....... | ...... | १ |
| सौप्तिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या | ८१०॥। |