भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3102

हतपुत्रो हतामात्यो हतसर्वसुहृज्जनः । दुःखं नूनं भविष्यामि विचरन् पृथिवीमिमाम् ॥ १० ॥ धृतराष्ट्र बोले—संजय! मेरे पुत्र, मन्त्री और समस्त सुहृद् मारे गये। अब तो अवश्य ही मैं इस पृथ्वीपर भटकता हुआ केवल दुःख-ही-दुःख भोगूँगा ॥ किं नु बन्धुविहीनस्य जीवितेन ममाद्य वै । लूनपक्षस्य इव मे जराजीर्णस्य पक्षिणः ॥ ११ ॥ जिसकी पाँखें काट ली गयी हों, उस जराजीर्ण पक्षीके समान बन्धु-बान्धवोंसे हीन हुए मुझ वृद्धको अब इस जीवनसे क्या प्रयोजन है? ॥ ११ ॥ हृतराज्यो हतबन्धुर्हतचक्षुश्च वै तथा । न भ्राजिष्ये महाप्राज्ञ क्षीणरश्मिरिवांशुमान् ॥ १२ ॥ महामते! मेरा राज्य छिन गया, बन्धु-बान्धव मारे गये और आँखें तो पहलेसे ही नष्ट हो चुकी थीं। अब मैं क्षीण किरणोंवाले सूर्यके समान इस जगत्में प्रकाशित नहीं होऊँगा ॥ न कृतं सुहृदां वाक्यं जामदग्न्यस्य जल्पतः । नारदस्य च देवर्षेः कृष्णद्वैपायनस्य च ॥ १३ ॥ मैंने सुहृदोंकी बात नहीं मानी, जमदग्निनन्दन परशुराम, देवर्षि नारद तथा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास सबने हितकी बात बतायी थी, पर मैंने किसीकी नहीं सुनी ॥ १३ ॥ सभामध्ये तु कृष्णेन यच्छ्रेयोऽभिहितं मम । अलं वैरेण ते राजन् पुत्रः संगृह्यतामिति ॥ १४ ॥ तच्च वाक्यमकृत्वाहं भृशं तप्यामि दुर्मतिः । श्रीकृष्णने सारी सभाके बीचमें मेरे भलेके लिये कहा था—'राजन्! वैर बढ़ानेसे आपको क्या लाभ है? अपने पुत्रोंको रोकिये।' उनकी उस बातको न मानकर आज मैं अत्यन्त संतप्त हो रहा हूँ। मेरी बुद्धि बिगड़ गयी थी ॥ न हि श्रोतास्मि भीष्मस्य धर्मयुक्तं प्रभाषितम् ॥ १५ ॥ दुर्योधनस्य च तथा वृषभस्येव नर्दतः । हाय! अब मैं भीष्मजीकी धर्मयुक्त बात नहीं सुन सकूँगा। साँड़के समान गर्जनेवाले दुर्योधनके वीरोचित वचन भी अब मेरे कानोंमें नहीं पड़ सकेंगे ॥ १५½ ॥ दुःशासनवधं श्रुत्वा कर्णस्य च विपर्ययम् ॥ १६ ॥ द्रोणसूर्योपरागं च हृदयं मे विदीर्यते । दुःशासन मारा गया, कर्णका विनाश हो गया और द्रोणरूपी सूर्यपर भी ग्रहण लग गया, यह सब सुनकर मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है ॥ १६½ ॥ न स्मराम्यात्मनः किंचित् पुरा संजय दुष्कृतम् ॥ १७ ॥ यस्येदं फलमद्येह मया मूढेन भुज्यते ।