भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 3108

जितने प्राणी हैं, वे जन्मसे पहले यहाँ व्यक्त नहीं थे। वे बीचमें ही व्यक्त होकर दिखायी देते हैं और अन्तमें पुनः उनका अभाव (अव्यक्तरूपसे अवस्थान) हो जायगा। ऐसी अवस्थामें उनके लिये रोने-धोनेकी क्या आवश्यकता है? ।। ६ ।।

न शोचन् मृतमन्वेति न शोचन् म्रियते नरः ।
एवं सांसिद्धिके लोके किमर्थमनुशोचसि ।। ७ ।।
शोक करनेवाला मनुष्य न तो मरनेवालेके साथ जा सकता है और न मर ही सकता है। जब लोककी ऐसी ही स्वाभाविक स्थिति है, तब आप किसलिये शोक कर रहे हैं? ।। ७ ।।

कालः कर्षति भूतानि सर्वाणि विविधान्युत ।
न कालस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यः कुरुसत्तम ।। ८ ।।
कुरुश्रेष्ठ! काल नाना प्रकारके समस्त प्राणियोंको खींच लेता है। कालको न तो कोई प्रिय है और न उसके द्वेषका ही पात्र है ।। ८ ।।

यथा वायुस्तृणाग्राणि संवर्तयति सर्वशः ।
तथा कालवशं यान्ति भूतानि भरतर्षभ ।। ९ ।।
भरतश्रेष्ठ! जैसे हवा तिनकोंको सब ओर उड़ाती और डालती रहती है, उसी प्रकार समस्त प्राणी कालके अधीन होकर आते-जाते हैं ।। ९ ।।

एकसार्थप्रयातानां सर्वेषां तत्र गमिनाम् ।
यस्य कालः प्रयात्यग्रे तत्र का परिदेवना ।। १० ।।
जो एक साथ संसारकी यात्रामें आये हैं, उन सबको एक दिन वहीं (परलोकमें) जाना है। उनमेंसे जिसका काल पहले उपस्थित हो गया, वह आगे चला जाता है। ऐसी दशामें किसीके लिये शोक क्या करना है? ।। १० ।।

न चाप्येतान् हतान् युद्धे राजन् शोचितुमर्हसि ।
प्रमाणं यदि शास्त्राणि गतास्ते परमां गतिम् ।। ११ ।।
राजन्! युद्धमें मारे गये इन वीरोंके लिये तो आपको शोक करना ही नहीं चाहिये। यदि आप शास्त्रोंका प्रमाण मानते हैं तो वे निश्चय ही परम गतिको प्राप्त हुए हैं ।। ११ ।।

सर्वे स्वाध्यायवन्तो हि सर्वे च चरितव्रताः ।
सर्वे चाभिमुखाः क्षीणास्तत्र का परिदेवना ।। १२ ।।
वे सभी वीर वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले थे। सबने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था तथा वे सभी युद्धमें शत्रुका सामना करते हुए वीरगतिको प्राप्त हुए हैं; अतः उनके लिये शोक करनेकी क्या बात है? ।। १२ ।।

अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः ।
नैते तव न तेषां त्वं तत्र का परिदेवना ।। १३ ।।
ये अदृश्य जगत्‌से आये थे और पुनः अदृश्य जगत्‌में ही चले गये हैं। ये न तो आपके थे और न आप ही इनके हैं। फिर यहाँ शोक करनेका क्या कारण है? ।। १३ ।।