महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरे लोग वहाँ उनमें कोई ऐसा अन्तर देख पाते हैं, जिससे वे उनके कुल और रूपकी विशेषताको समझ सकें; फिर भी वे मनुष्य एक-दूसरेको क्यों चाहते हैं? इसलिये कि उनकी बुद्धि ठगी गयी है ॥ ५—७ ॥ गृहाणीव हि मर्त्यानामाहुर्देहानि पण्डिताः । कालेन विनियुज्यन्ते सत्त्वमेकं तु शाश्वतम् ॥ ८ ॥ पण्डितलोग मरणधर्मा प्राणियोंके शरीरोंको घरके तुल्य बतलाते हैं; क्योंकि सारे शरीर समयपर नष्ट हो जाते हैं, किंतु उसके भीतर जो एकमात्र सत्त्वस्वरूप आत्मा है, वह नित्य है ॥ ८ ॥ यथा जीर्णमजीर्णं वा वस्त्रं त्यक्त्वा तु पूरुषः । अन्यद् रोचयते वस्त्रमेवं देहाः शरीरिणाम् ॥ ९ ॥ जैसे मनुष्य नये अथवा पुराने वस्त्रको उतारकर दूसरे नूतन वस्त्रको पहननेकी रुचि रखता है, उसी प्रकार देहधारियोंके शरीर उनके द्वारा समय-समयपर त्यागे और ग्रहण किये जाते हैं ॥ ९ ॥ वैचित्रवीर्य प्राप्यं हि दुःखं वा यदि वा सुखम् । प्राप्नुवन्तीह भूतानि स्वकृतेनैव कर्मणा ॥ १० ॥ विचित्रवीर्यनन्दन! यदि दुःख या सुख प्राप्त होनेवाला है तो प्राणी उसे अपने किये हुए कर्मके अनुसार ही पाते हैं ॥ १० ॥ कर्मणा प्राप्यते स्वर्गः सुखं दुःखं च भारत । ततो वहति तं भारमवशः स्ववशोऽपि वा ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! कर्मके अनुसार ही परलोकमें स्वर्ग या नरक तथा इहलोकमें सुख और दुःख प्राप्त होते हैं; फिर मनुष्य सुख या दुःखके उस भारको स्वाधीन या पराधीन होकर ढोता रहता है ॥ ११ ॥ यथा च मृण्मयं भाण्डं चक्रारूढं विपद्यते । किंचित् प्रक्रियमाणं वा कृतमात्रमथापि वा ॥ १२ ॥ छिन्नं वाप्यवरोप्यन्तमवतीर्णमथापि वा । आर्द्रं वाप्यथवा शुष्कं पच्यमानमथापि वा ॥ १३ ॥ उत्तार्यमाणमापाकादुद्धृतं चापि भारत । अथवा परिभुज्यन्तमेवं देहाः शरीरिणाम् ॥ १४ ॥ जैसे मिट्टीका बर्तन बनाये जानेके समय कभी चाकपर चढ़ाते ही नष्ट हो जाता है, कभी कुछ-कुछ बननेपर, कभी पूरा बन जानेपर, कभी सूतसे काट देनेपर, कभी चाकसे उतारते समय, कभी उतर जानेपर, कभी गीली या सूखी अवस्थामें, कभी पकाये जाते समय, कभी आवाँसे उतारते समय, कभी पाकस्थानसे उठाकर ले जाते समय अथवा कभी उसे उपयोगमें लाते समय फूट जाता है; ऐसी ही दशा देहधारियोंके शरीरोंकी भी होती है ॥