भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3118

जो लोग हीन कुलमें उत्पन्न हुए हैं, उनकी निन्दा करता हुआ कुलीन मनुष्य अपनी कुलीनतामें ही मस्त रहता है और धनी धनके घमंडसे चूर होकर दरिद्रोंके प्रति अपनी घृणा प्रकट करता है ।। १३ ।। मूर्खानिति परानाह नात्मानं समवेक्षते । दोषान् क्षिपति चान्येषां नात्मानं शास्तुमिच्छति ।। १४ ।। वह दूसरोंको तो मूर्ख बताता है, पर अपनी ओर कभी नहीं देखता। दूसरोंके दोषोंके लिये उनपर आक्षेप करता है, परंतु उन्हीं दोषोंसे स्वयंको बचानेके लिये अपने मनको काबूमें नहीं रखना चाहता ।। १४ ।। यदा प्राज्ञाश्च मूर्खाश्च धनवन्तश्च निर्धनाः । कुलीनाश्चाकुलीनाश्च मानिनोऽथाप्यमानिनः ।। १५ ।। सर्वे पितृवनं प्राप्ताः स्वपन्ति विगतत्वचः । निर्मांसैरस्थिभूयिष्ठैर्गात्रैः स्नायुनिबन्धनैः ।। १६ ।। विशेषं न प्रपश्यन्ति तत्र तेषां परे जनाः । येन प्रत्यवगच्छेयुः कुलरूपविशेषणम् ।। १७ ।। जब ज्ञानी और मूर्ख, धनवान् और निर्धन, कुलीन और अकुलीन तथा मानी और मानरहित सभी मरघटमें जाकर सो जाते हैं, उनकी चमड़ी भी नष्ट हो जाती है और नाड़ियोंसे बँधे हुए मांसरहित हड्डियोंके ढेररूप उनके नग्न शरीर सामने आते हैं, तब वहाँ खड़े हुए दूसरे लोग उनमें कोई ऐसा अन्तर नहीं देख पाते हैं, जिससे एककी अपेक्षा दूसरेके कुल और रूपकी विशेषताको जान सकें ।। यदा सर्वे समं न्यस्ताः स्वपन्ति धरणीतले । कस्मादन्योन्यमिच्छन्ति प्रलब्धुमिह दुर्बुधाः ।। १८ ।। जब मरनेके बाद श्मशानमें डाल दिये जानेपर सभी लोग समानरूपसे पृथ्वीकी गोदमें सोते हैं, तब वे मूर्ख मानव इस संसारमें क्यों एक-दूसरेको ठगनेकी इच्छा करते हैं? ।। १८ ।। प्रत्यक्षं च परोक्षं च यो निशम्य श्रुतिं त्विमाम् । अध्रुवे जीवलोकेऽस्मिन् यो धर्ममनुपालयन् । जन्मप्रभृति वर्तेत प्राप्नुयात् परमां गतिम् ।। १९ ।। इस क्षणभंगुर जगत्में जो पुरुष इस वेदोक्त उपदेशको साक्षात् जानकर या किसीके द्वारा सुनकर जन्मसे ही निरन्तर धर्मका पालन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ।। १९ ।। एवं सर्वं विदित्वा वै यस्तत्त्वमनुवर्तते । स प्रमोक्षाय लभते पन्थानं मनुजेश्वर ।। २० ।।