भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3137

कथं ते शोकनाशः स्यात् प्राणेषु च दया प्रभो । स्नेहश्च पाण्डुपुत्रेषु ज्ञात्वा दैवकृतं विधिम् ॥ ४० ॥ प्रभो! नारदजीकी वह बात सुनकर उस समय पाण्डव बहुत चिन्तित हो गये थे। इस प्रकार मैंने तुमसे देवताओंका यह सारा सनातन रहस्य बताया है, जिससे किसी तरह तुम्हारे शोकका नाश हो। तुम अपने प्राणोंपर दया कर सको और देवताओंका विधान समझकर पाण्डुके पुत्रोंपर भी तुम्हारा स्नेह बना रहे ॥ ३९-४० ॥

एष चार्थो महाबाहो पूर्वमेव मया श्रुतः । कथितो धर्मराजस्य राजसूये क्रतूत्तमे ॥ ४१ ॥ महाबाहो! यह बात मैंने बहुत पहले ही सुन रखी थी और क्रतुश्रेष्ठ राजसूयमें धर्मराज युधिष्ठिरको बता भी दी थी ॥ ४१ ॥

यतितं धर्मपुत्रेण मया गुह्ये निवेदिते । अविग्रहे कौरवाणां दैवं तु बलवत्तरम् ॥ ४२ ॥ मेरे द्वारा उस गुप्त रहस्यके बता दिये जानेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने बहुत प्रयत्न किया कि कौरवोंमें परस्पर कलह न हो; परंतु दैवका विधान बड़ा प्रबल होता है ॥

अनतिक्रमणीयो हि विधी राजन् कथंचन । कृतान्तस्य तु भूतेन स्थावरेण चरेण च ॥ ४३ ॥ राजन्! दैव अथवा कालके विधानको चराचर प्राणियोंमेंसे कोई भी किसी तरह लाँघ नहीं सकता ॥ ४३ ॥

भवान् धर्मपरो यत्र बुद्धिश्रेष्ठश्च भारत । मुह्यते प्राणिनां ज्ञात्वा गतिं चागतिमेव च ॥ ४४ ॥ भरतनन्दन! तुम धर्मपरायण और बुद्धिमें श्रेष्ठ हो। तुम्हें प्राणियोंके आवागमनका रहस्य भी ज्ञात है, तो भी क्यों मोहके वशीभूत हो रहे हो? ॥ ४४ ॥

त्वां तु शोकेन संतप्तं मुह्यमानं मुहुर्मुहुः । ज्ञात्वा युधिष्ठिरो राजा प्राणानपि परित्यजेत् ॥ ४५ ॥ तुम्हें बारंबार शोकसे संतप्त और मोहित होते जानकर राजा युधिष्ठिर अपने प्राणोंका भी परित्याग कर देंगे ॥

कृपालुर्नित्यशो वीरस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि । स कथं त्वयि राजेन्द्र कृपां नैव करिष्यति ॥ ४६ ॥ राजेन्द्र! वीर युधिष्ठिर पशु-पक्षी आदि योनिके प्राणियोंपर भी सदा दयाभाव बनाये रखते हैं; फिर तुमपर वे कैसे दया नहीं करेंगे? ॥ ४६ ॥

मम चैव नियोगेन विधेश्चाप्यनिवर्तनात् । पाण्डवानां च कारुण्यात् प्राणान् धारय भारत ॥ ४७ ॥

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