भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 314

सर्वमूर्धाभिषिक्तानामाचार्यो ब्रह्मवित्तमः । अर्जुनस्य सुतं मूढं नायं हन्तुमिहेच्छति ॥ १६ ॥ ये सम्पूर्ण मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आचार्य तथा सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता द्रोण अर्जुनके इस मूढ़ पुत्रको मारना नहीं चाहते हैं ॥ १६ ॥ न ह्यस्य समरे युद्ध्येदन्तकोऽप्यातातयिनः । किमङ्ग पुनरेवान्यो मर्त्यः सत्यं ब्रवीमि वः ॥ १७ ॥ ‘प्रिय सैनिको! मैं आपलोगोंसे सच्ची बात कहता हूँ। यदि ये युद्धमें मारनेके लिये उद्यत हो जायँ तो इनके सामने यमराज भी युद्ध नहीं कर सकता; फिर दूसरा कोई मनुष्य तो इनके सामने टिक ही कैसे सकता है? ॥ अर्जुनस्य सुतं त्वेष शिष्यत्वादभिरक्षति । शिष्याः पुत्राश्च दयितास्तदपत्यं च धर्मिणाम् ॥ १८ ॥ ‘परंतु ये अर्जुनके पुत्रकी रक्षा करते हैं; क्योंकि अर्जुन इनके शिष्य हैं। शिष्य और पुत्र तो प्रिय होते ही हैं। उनकी संतानें भी धर्मात्मा पुरुषोंको प्रिय जान पड़ती हैं ॥ १८ ॥ संरक्ष्यमाणो द्रोणेन मन्यते वीर्यमात्मनः । आत्मसम्भावितो मूढस्तं प्रमथ्नीत मा चिरम् ॥ १९ ॥ ‘यह द्रोणाचार्यसे रक्षित होनेके कारण अपने बल और पराक्रमपर अभिमान कर रहा है। यह मूर्ख अभिमन्यु आत्मश्लाघा करनेवाला है। तुम सब लोग मिलकर इसे शीघ्र ही मथ डालो’ ॥ १९ ॥ एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सात्वतीपुत्रमभ्ययुः । संरब्धास्ते जिघांसन्तो भारद्वाजस्य पश्यतः ॥ २० ॥ राजा दुर्योधनके ऐसा कहनेपर सब वीर अत्यन्त कुपित हो सुभद्राकुमार अभिमन्युको मार डालनेकी इच्छासे द्रोणाचार्यके देखते-देखते उसपर टूट पड़े ॥ २० ॥ दुःशासनस्तु तच्छ्रुत्वा दुर्योधनवचस्तदा । अब्रवीत् कुरुशार्दूल दुर्योधनमिदं वचः ॥ २१ ॥ कुरुश्रेष्ठ! उस समय दुर्योधनके उपर्युक्त वचनको सुनकर दुःशासनने उससे यह बात कही— ॥ २१ ॥ अहमेनं हनिष्यामि महाराज ब्रवीमि ते । मिषतां पाण्डुपुत्राणां पञ्चालानां च पश्यताम् ॥ २२ ॥ ‘महाराज! मैं आपसे (प्रतिज्ञापूर्वक) कहता हूँ। मैं पांचालों और पाण्डवोंके देखते-देखते इस अभिमन्युको मार डालूँगा ॥ २२ ॥ ग्रसिष्याम्यद्य सौभद्रं यथा राहुर्दिवाकरम् । उत्क्रुश्य चाब्रवीद् वाक्यं कुरुराजमिदं पुनः ॥ २३ ॥