भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3142

'काल सभी विविध प्राणियोंको खींचता है। कुरुश्रेष्ठ! कालके लिये न तो कोई प्रिय है और न कोई द्वेषका पात्र ही ।। १४ ।। यथा वायुस्तृणाग्राणि संवर्तयति सर्वतः । तथा कालवशं यान्ति भूतानि भरतर्षभ ।। १५ ।। 'भरतश्रेष्ठ! जैसे वायु तिनकोंको सब ओर उड़ाती और गिराती रहती है, उसी प्रकार सारे प्राणी कालके अधीन होकर आते-जाते रहते हैं ।। १५ ।। एकसार्थप्रयातानां सर्वेषां तत्र गामिनाम् । यस्य कालः प्रयात्यग्रे तत्र का परिदेवना ।। १६ ।। 'एक साथ आये हुए सभी प्राणियोंको एक दिन वहीं जाना है। जिसका काल आ गया, वह पहले चला जाता है; फिर उसके लिये व्यर्थ शोक क्यों? ।। १६ ।। यांश्चापि निहतान् युद्धे राजंस्त्वमनुशोचसि । न शोच्या हि महात्मानः सर्वे ते त्रिदिवं गताः ।। १७ ।। 'राजन्! जो लोग युद्धमें मारे गये हैं और जिनके लिये आप बारंबार शोक कर रहे हैं, वे महामनस्वी वीर शोक करनेके योग्य नहीं हैं, वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें चले गये ।। १७ ।। न यज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्न तपोभिर्न विद्यया । तथा स्वर्गमुपायान्ति यथा शूरास्तनुत्यजः ।। १८ ।। 'अपने शरीरका त्याग करनेवाले शूरवीर जिस तरह स्वर्गमें जाते हैं, उस तरह दक्षिणावाले यज्ञों, तपस्याओं तथा विद्यासे भी कोई नहीं जा सकता ।। १८ ।। सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः । सर्वे चाभिमुखाः क्षीणास्तत्र का परिदेवना ।। १९ ।। 'वे सभी वीर वेदवेत्ता और अच्छी तरह ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले थे। वे सब-के-सब शत्रुओंका सामना करते हुए मारे गये थे; अतः उनके लिये शोक करनेकी क्या आवश्यकता है? ।। १९ ।। शरीराग्निषु शूराणां जुहुवुस्ते शराहुतीः । हूयमानान् शरांश्चैव सेहुरुत्तमपूरुषाः ।। २० ।। 'उन श्रेष्ठ पुरुषोंने शूरवीरोंके शरीररूपी अग्नियोंमें बाणरूपी हविष्यकी आहुतियाँ दी थीं और अपने शरीरमें जिनका हवन किया गया था, उन बाणोंका आघात सहन किया था ।। २० ।। एवं राजंस्तवाचक्षे स्वर्ग्यं पन्थानमुत्तमम् । न युद्धादधिकं किंचित् क्षत्रियस्येह विद्यते ।। २१ ।। 'राजन्! मैं तुम्हें स्वर्गप्राप्तिका सबसे उत्तम मार्ग बता रहा हूँ। इस जगत्में क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर स्वर्गसाधक दूसरा कोई उपाय नहीं है ।। २१ ।। क्षत्रियास्ते महात्मानः शूराः समितिशोभनाः ।