महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउच्यमानस्तु यः श्रेयो गृह्णीते नो हिताहिते ।
आपदः समनुप्राप्य स शोचत्यनये स्थितः ॥ ७ ॥
‘जो हितकी बात बतानेपर भी हिताहितकी बातको नहीं समझ पाता, वह अन्यायका आश्रय ले बड़ी भारी विपत्तिमें पड़कर शोक करता है ॥ ७ ॥
ततोऽन्यवृत्तमात्मानं समवेक्षस्व भारत ।
राजंस्त्वं ह्यविधेयात्मा दुर्योधनवशे स्थितः ॥ ८ ॥
‘भरतनन्दन! आप अपनी ओर तो देखिये। आपका बर्ताव सदा ही न्यायके विपरीत रहा है। राजन्! आप अपने मनको वशमें न करके सदा दुर्योधनके अधीन रहे हैं ॥
आत्मापराधादापन्नस्तत् किं भीमं जिघांससि ।
तस्मात् संयच्छ कोपं त्वं स्वमनुस्मर दुष्कृतम् ॥ ९ ॥
‘अपने ही अपराधसे विपत्तिमें पड़कर आप भीमसेनको क्यों मार डालना चाहते हैं? इसलिये क्रोधको रोकिये और अपने दुष्कर्मोंको याद कीजिये ॥ ९ ॥