महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3159, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयस्तु तां स्पर्धया क्षुद्रः पाञ्चालीमानयत् सभाम् । स हतो भीमसेनेन वैरं प्रतिजिहीर्षता ॥ १० ॥ 'जिस नीच दुर्योधनने मनमें जलन रखनेके कारण पांचालराजकुमारी कृष्णाको भरी सभामें बुलाकर अपमानित किया, उसे वैरका बदला लेनेकी इच्छासे भीमसेनने मार डाला ॥ १० ॥
आत्मनोऽतिक्रमं पश्य पुत्रस्य च दुरात्मनः । यदनागसि पाण्डूनां परित्यागस्त्वया कृतः ॥ ११ ॥ 'आप अपने और दुरात्मा पुत्र दुर्योधनके उस अत्याचारपर तो दृष्टि डालिये, जब कि बिना किसी अपराधके ही आपने पाण्डवोंका परित्याग कर दिया था' ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स कृष्णेन सर्वं सत्यं जनाधिप । उवाच देवकीपुत्रं धृतराष्ट्रो महीपतिः ॥ १२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर! जब इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने सब सच्ची-सच्ची बातें कह डालीं, तब पृथ्वीपति धृतराष्ट्रने देवकीनन्दन श्रीकृष्णसे कहा— ॥
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव । पुत्रस्नेहस्तु बलवान् धैर्यान्मां समचालयत् ॥ १३ ॥ 'महाबाहु! माधव! आप जैसा कह रहे हैं, ठीक ऐसी ही बात है; परंतु पुत्रका स्नेह प्रबल होता है, जिसने मुझे धैर्यसे विचलित कर दिया था ॥ १३ ॥
दिष्ट्या तु पुरुषव्याघ्रो बलवान् सत्यविक्रमः । त्वद्गुप्तो नागमत् कृष्ण भीमो बाह्वन्तरं मम ॥ १४ ॥ 'श्रीकृष्ण! सौभाग्यकी बात है कि आपसे सुरक्षित होकर बलवान् सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह भीमसेन मेरी दोनों भुजाओंके बीचमें नहीं आये ॥ १४ ॥
इदानीं त्वहमव्यग्रो गतमन्युर्गतज्वरः । मध्यमं पाण्डवं वीर द्रष्टुमिच्छामि माधव ॥ १५ ॥ 'माधव! अब इस समय मैं शान्त हूँ। मेरा क्रोध उतर गया है और चिन्ता भी दूर हो गयी है; अतः मैं मध्यम पाण्डव वीर अर्जुनको देखना चाहता हूँ ॥ १५ ॥
हतेषु पार्थिवेन्द्रेषु पुत्रेषु निहतेषु च । पाण्डुपुत्रेषु वै शर्म प्रीतिश्चाप्यवतिष्ठते ॥ १६ ॥ 'समस्त राजाओं तथा अपने पुत्रोंके मारे जानेपर अब मेरा प्रेम और हितचिन्तन पाण्डुके इन पुत्रोंपर ही आश्रित है' ॥ १६ ॥
ततः स भीमं च धनंजयं च माद्रयाश्च पुत्रौ पुरुषप्रवीरौ ।