महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3162, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंन कोपः पाण्डवे कार्यो गान्धारि शममाप्नुहि । वचो निगृह्यतामेतच्छृणु चेदं वचो मम ॥ ७ ॥ 'गान्धारराजकुमारी! शान्त हो जाओ। तुम्हें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरपर क्रोध नहीं करना चाहिये। अभी-अभी जो बात मुँहसे निकालना चाहती हो, उसे रोक लो और मेरी यह बात सुनो ॥ ७ ॥
उक्तास्यष्टादशाहानि पुत्रेण जयमिच्छता । शिवमाशास्व मे मातर्युध्यमानस्य शत्रुभिः ॥ ८ ॥ 'गत अठारह दिनोंमें विजयकी अभिलाषा रखनेवाला तुम्हारा पुत्र प्रतिदिन तुमसे जाकर कहता था कि 'माँ! मैं शत्रुओंके साथ युद्ध करने जा रहा हूँ। तुम मेरे कल्याणके लिये आशीर्वाद दो' ॥ ८ ॥
सा तथा याच्यमाना त्वं काले काले जयैषिणा । उक्तवत्यसि गान्धारि यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ९ ॥ 'इस प्रकार जब विजयाभिलाषी दुर्योधन समय-समयपर तुमसे प्रार्थना करता था, तब तुम सदा यही उत्तर देती थी कि 'जहाँ धर्म है, वहीं विजय है' ॥ ९ ॥
न चाप्यतीतां गान्धारि वाचं ते वितथामहम् । स्मरामि भाषमाणायास्तथा प्राणिहिता ह्यसि ॥ १० ॥ 'गान्धारी! तुमने बातचीतके प्रसंगमें भी पहले कभी झूठ कहा हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं है तथा तुम सदा प्राणियोंके हितमें तत्पर रहती आयी हो ॥ १० ॥
विग्रहे तुमुले राज्ञां गत्वा पारमसंशयम् । जितं पाण्डुसुतैर्युद्धे नूनं धर्मस्ततोऽधिकः ॥ ११ ॥ 'राजाओंके इस घोर संग्रामसे पार होकर पाण्डवोंने जो युद्धमें विजय पायी है, इससे निःसंदेह यह बात सिद्ध हो गयी कि 'धर्मका बल सबसे अधिक है' ॥ ११ ॥
क्षमाशीला पुरा भूत्वा साद्य न क्षमसे कथम् । अधर्मं जहि धर्मज्ञे यतो धर्मस्ततो जयः ॥ १२ ॥ 'धर्मज्ञे! तुम तो पहले बड़ी क्षमाशील थी। अब क्यों नहीं क्षमा करती हो? अधर्म छोड़ो, क्योंकि जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ॥ १२ ॥
स्वं च धर्मं परिस्मृत्य वाचं चोक्तां मनस्विनि । कोपं संयच्छ गान्धारि मैवं भूः सत्यवादिनि ॥ १३ ॥ 'मनस्विनी गान्धारी! अपने धर्म तथा कही हुई बातका स्मरण करके क्रोधको रोको। सत्यवादिनि! अब फिर तुम्हारा ऐसा बर्ताव नहीं होना चाहिये' ॥ १३ ॥
गान्धार्युवाच भगवन्नाभ्यसूयामि नैतानिच्छामि नश्यतः ।