भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3167

अपिबः शोणितं संख्ये दुःशासनशरीरजम् ॥ १३ ॥ सद्भिर्विगर्हितं घोरमनार्यजनसेवितम् । क्रूरं कर्माकृथास्तस्मात्तदयुक्तं वृकोदर ॥ १४ ॥ भारत! परंतु वृषसेनने जब नकुलके घोड़ोंको मारकर उसे रथहीन कर दिया था, उस समय तुमने युद्धमें दुःशासनको मारकर जो उसका खून पी लिया, वह सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित और नीच पुरुषोंद्वारा सेवित घोर क्रूरतापूर्ण कर्म है। वृकोदर! तुमने वही क्रूर कार्य किया है, इसलिये तुम्हारे द्वारा अत्यन्त अयोग्य कर्म बन गया है ॥

भीमसेन उवाच

अन्यस्यापि न पातव्यं रुधिरं किं पुनः स्वकम् । यथैवात्मा तथा भ्राता विशेषो नास्ति कश्चन ॥ १५ ॥ भीमसेन बोले—माताजी! दूसरेका भी खून नहीं पीना चाहिये; फिर अपना ही खून कोई कैसे पी सकता है? जैसे अपना शरीर है, वैसे ही भाईका शरीर है। अपनेमें और भाईमें कोई अन्तर नहीं है ॥ १५ ॥ रुधिरं न व्यतिक्रामद् दन्तोष्ठं मेऽम्ब मा शुचः । वैवस्वतस्तु तद् वेद हस्तौ मे रुधिरोक्षितौ ॥ १६ ॥ माँ! आप शोक न करें। वह खून मेरे दाँतों और ओठोंको लाँघकर आगे नहीं जा सका था। इस बातको सूर्यपुत्र यमराज जानते हैं कि केवल मेरे दोनों हाथ ही रक्तमें सने हुए थे ॥ १६ ॥ हताश्वं नकुलं दृष्ट्वा वृषसेनेन संयुगे । भ्रातॄणां सम्प्रहृष्टानां त्रासः संजनितो मया ॥ १७ ॥ युद्धमें वृषसेनके द्वारा नकुलके घोड़ोंको मारा गया देख जो दुःशासनके सभी भाई हर्षसे उल्लसित हो उठे थे, उनके मनमें वैसा करके मैंने केवल त्रास उत्पन्न किया था ॥ १७ ॥ केशपक्षपरामर्शे द्रौपद्या द्यूतकारिते । क्रोधाद् यदब्रुवं चाहं तच्च मे हृदि वर्तते ॥ १८ ॥ द्यूतक्रीडाके समय जब द्रौपदीका केश खींचा गया, उस समय क्रोधमें भरकर मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी याद हमारे हृदयमें बराबर बनी रहती थी ॥ १८ ॥ क्षत्रधर्माच्च्युतो राज्ञि भवेयं शाश्वतीः समाः । प्रतिज्ञां तामनिस्तीर्य ततस्तत् कृतवानहम् ॥ १९ ॥ रानीजी! यदि मैं उस प्रतिज्ञाको पूर्ण न करता तो सदाके लिये क्षत्रियधर्मसे गिर जाता, इसलिये मैंने यह काम किया था ॥ १९ ॥ न मामर्हसि गान्धारि दोषेण परिशङ्कितुम् ।