भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3184, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 3184

‘वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! मैंने दुर्योधनद्वारा शासित हुई इस पृथ्वीको हाथी, घोड़े और गौओंसे भरी-पूरी देखा था; किंतु वह राज्य चिरस्थायी न रह सका ॥ २२ ॥ तामेवाद्य महाबाहो पश्याम्यन्यानुशासिताम् । हीनां हस्तिगवाश्वेन किं नु जीवामि माधव ॥ २३ ॥ ‘महाबाहु माधव! आज उसी पृथ्वीको मैं देखती हूँ कि वह दूसरेके शासनमें जाकर हाथी, घोड़े और गाय-बैलोंसे हीन हो गयी है; फिर मैं किसलिये जीवन धारण करूँ? ॥ २३ ॥ इदं कष्टतरं पश्य पुत्रस्यापि वधान्मम । यदिमाः पर्युपासन्ते हतान् शूरान् रणे स्त्रियः ॥ २४ ॥ ‘मेरे लिये पुत्रके वधसे भी अधिक कष्ट देनेवाली बात यह है कि स्त्रियाँ रणभूमिमें मारे गये अपने शूरवीर पतियोंके पास बैठी रो रही हैं। इनकी दयनीय दशा तो देखो ॥ २४ ॥ प्रकीर्णकेशां सुश्रोणीं दुर्योधनशुभाङ्कगाम् । रुक्मवेदिनिभां पश्य कृष्ण लक्ष्मणमातरम् ॥ २५ ॥ श्रीकृष्ण! सुवर्णकी वेदीके समान तेजस्विनी तथा सुन्दर कटि-प्रदेशवाली उस लक्ष्मणकी माताको तो देखो, जो दुर्योधनके शुभ-अंकमें स्थित हो केश खोले रो रही है ॥ २५ ॥ नूनमेषा पुरा बाला जीवमाने महीभुजे । भुजावाश्रित्य रमते सुभुजस्य मनस्विनी ॥ २६ ॥ ‘पहले जब राजा दुर्योधन जीवित था, तब निश्चय ही यह मनस्विनी बाला सुन्दर बाहोंवाले अपने वीर पतिकी दोनों भुजाओंका आश्रय लेकर इसी तरह उसके साथ सानन्द क्रीड़ा करती रही होगी ॥ २६ ॥ कथं नु शतधा नेदं हृदयं मम दीर्यते । पश्यन्त्या निहतं पुत्रं पुत्रेण सहितं रणे ॥ २७ ॥ ‘रणभूमिमें वही मेरा पुत्र अपने पुत्रके साथ ही मार डाला गया है, इसे इस अवस्थामें देखकर मेरे इस हृदयके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते? ॥ २७ ॥ पुत्रं रुधिरसंसिक्तमुपजिघ्रत्यनिन्दिता । दुर्योधनं तु वामोरुः पाणिना परिमार्जती ॥ २८ ॥ ‘सुन्दर जाँघोंवाली मेरी सती साध्वी पुत्रवधू कभी खूनसे भीगे हुए अपने पुत्र लक्ष्मणका मुँह सूँघती है तो कभी पति दुर्योधनका शरीर अपने हाथसे पोंछती है ॥ किं नु शोचति भर्तारं पुत्रं चैषा मनस्विनी । तथा ह्यवस्थिता भाति पुत्रं चाप्यभिवीक्ष्य सा ॥ २९ ॥ स्वशिरः पञ्चशाखाभ्यामभिहत्यायतक्षणा । पतत्युरसि वीरस्य कुरुराजस्य माधव ॥ ३० ॥