महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3188, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकमलनयन! खिले हुए कमलके समान प्रकाशित होनेवाले युवतियोंके इन सुन्दर मुखोंको ये सूर्यदेव संतप्त कर रहे हैं ॥ १५ ॥ ईर्षूणां मम पुत्राणां वासुदेवावरोधनम् । मत्तमातङ्गदर्पाणां पश्यन्त्यद्य पृथग्जनाः ॥ १६ ॥ वासुदेव! मतवाले हाथीके समान घमंडमें चूर रहनेवाले मेरे ईर्ष्यालु पुत्रोंकी इन रानियोंको आज साधारण लोग देख रहे हैं ॥ १६ ॥ शतचन्द्राणि चर्माणि ध्वजांश्चादित्यवर्चसः । रौक्माणि चैव वर्माणि निष्कानपि च काञ्चनान् ॥ १७ ॥ शीर्षत्राणानि चैतानि पुत्राणां मे महीतले । पश्य दीप्तानि गोविन्द पावकान् सुहुतानिव ॥ १८ ॥ गोविन्द! देखो, मेरे पुत्रोंकी ये सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे सुशोभित ढालें, सूर्यके समान तेजस्विनी ध्वजाएँ, सुवर्णमय कवच, सोनेके निष्क तथा शिरस्त्राण घीकी उत्तम आहुति पाकर प्रज्वलित हुई अग्नियोंके समान पृथ्वीपर देदीप्यमान हो रहे हैं ॥ १७-१८ ॥ एष दुःशासनः शेते शूरेणामित्रघातिना । पीतशोणितसर्वाङ्गो युधि भीमेन पातितः ॥ १९ ॥ शत्रुघाती शूरवीर भीमसेनने युद्धमें जिसे मार गिराया तथा जिसके सारे अंगोंका रक्त पी लिया, वही यह दुःशासन यहाँ सो रहा है ॥ १९ ॥ गदया भीमसेनेन पश्य माधव मे सुतम् । द्यूतक्लेशाननुस्मृत्य द्रौपदीनोदितेन च ॥ २० ॥ माधव! देखो, द्यूतक्रीड़ाके समय पाये हुए क्लेशोंको स्मरण करके द्रौपदीसे प्रेरित हुए भीमसेनने मेरे इस पुत्रको गदासे मार डाला है ॥ २० ॥ उक्ता ह्यनेन पाञ्चाली सभायां द्यूतनिर्जिता । प्रियं चिकीर्षता भ्रातुः कर्णस्य च जनार्दन ॥ २१ ॥ सहैव सहदेवेन नकुलेनार्जुनेन च । दासीभूतासि पाञ्चालि क्षिप्रं प्रविश नो गृहान् ॥ २२ ॥ जनार्दन! इसने अपने भाई और कर्णका प्रिय करनेकी इच्छासे सभामें जूएसे जीती गयी द्रौपदीके प्रति कहा था कि 'पांचाली! तू नकुल-सहदेव तथा अर्जुनके साथ ही हमारी दासी हो गयी; अतः शीघ्र ही हमारे घरोंमें प्रवेश कर' ॥ २१-२२ ॥ ततोऽहमब्रुवं कृष्ण तदा दुर्योधनं नृपम् । मृत्युपाशपरिक्षिप्तं शकुनिं पुत्र वर्जय ॥ २३ ॥ निबोधैनं सुदुर्बुद्धिं मातुलं कलहप्रियम् । क्षिप्रमेनं परित्यज्य पुत्र शाम्यस्व पाण्डवैः ॥ २४ ॥ न बुद्ध्यसे त्वं दुर्बुद्धे भीमसेनममर्षणम् ।