भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3202

पुत्रशोकाभितप्तेन प्रतिज्ञां चाभिरक्षता । पाकशासनिना संख्ये वार्धक्षत्रिनिर्पातितः ॥ ७ ॥ एकादश चमूर्भित्त्वा रक्ष्यमाणं महात्मना । सत्यं चिकीर्षता पश्य हतमेनं जयद्रथम् ॥ ८ ॥ श्रीकृष्ण! पुत्रशोकसे संतप्त हो अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन करते हुए इन्द्रकुमार अर्जुनने युद्धस्थलमें वृद्धक्षत्रके पुत्र जयद्रथको मार गिराया है। यद्यपि उसकी रक्षाकी पूरी व्यवस्था की गयी थी, तब भी अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाने की इच्छावाले महात्मा अर्जुनने ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंका भेदन करके जिसे मार डाला था, वही यह जयद्रथ यहाँ पड़ा है। इसे देखो ॥

सिन्धुसौवीरभर्तारं दर्पपूर्णं मनस्विनम् । भक्षयन्ति शिवा गृध्रा जनार्दन जयद्रथम् ॥ ९ ॥ जनार्दन! सिन्धु और सौवीर देशके स्वामी अभिमानी और मनस्वी जयद्रथको गीध और सियार नोच-नोचकर खा रहे हैं ॥ ९ ॥

संरक्ष्यमाणं भार्याभिरनुरक्ताभिरच्युत । भीषयन्त्यो विकर्षन्ति गहनं निम्नमन्तिकात् ॥ १० ॥ अच्युत! इसमें अनुराग रखनेवाली इसकी पत्नियाँ यद्यपि रक्षामें लगी हुई हैं, तथापि गीदड़ियाँ उन्हें डरवाकर जयद्रथकी लाशको उनके निकटसे गहरे गड्ढेकी ओर खींचे लिये जा रही हैं ॥ १० ॥

तमेताः पर्युपासन्ते रक्ष्यमाणं महाभुजम् । सिन्धुसौवीरभर्तारं काम्बोजयवनस्त्रियः ॥ ११ ॥ ये काम्बोज और यवनदेशकी स्त्रियाँ सिन्धु और सौवीरदेशके स्वामी महाबाहु जयद्रथको चारों ओरसे घेरकर बैठी हैं और वह उन्हींके द्वारा सुरक्षित हो रहा है ॥ ११ ॥

यदा कृष्णामुपादाय प्राद्रवत् केकयैः सह । तदैव वध्यः पाण्डूनां जनार्दन जयद्रथः ॥ १२ ॥ दुःशलां मानयद्भिस्तु तदा मुक्तो जयद्रथः । कथमद्य न तां कृष्ण मानयन्ति स्म ते पुनः ॥ १३ ॥ जनार्दन! जिस दिन जयद्रथ द्रौपदीको हरकर केकयोंके साथ भागा था, उसी दिन यह पाण्डवोंके द्वारा वध्य हो गया था; परंतु उस समय दुःशलाका सम्मान करते हुए उन्होंने जयद्रथको जीवित छोड़ दिया था! श्रीकृष्ण! उन्हीं पाण्डवोंने आज फिर क्यों नहीं उसका सम्मान किया? ॥ १२-१३ ॥

सैषा मम सुता बाला विलपन्ती च दुःखिता । आत्मना हन्ति चात्मानमाक्रोशन्ती च पाण्डवान् ॥ १४ ॥