महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअभिमन्युर्महाराज सैन्यमध्ये व्यरोचत ॥ २६ ॥
(यथा पुरा वह्निसुतोऽसुरसैन्येषु वीर्यवान् ।)
भरतनन्दन! हाथियों, घोड़ों और पैदलसैनिकोंकी आयुको छीनते हुए अभिमन्युको हमने क्षणभरमें दोपहरके सूर्यकी भाँति शत्रुसेनाको पुनः तपाते देखा था। महाराज! इन्द्रकुमार अर्जुनका वह पुत्र युद्धमें इन्द्रके समान पराक्रमी जान पड़ता था। जैसे पूर्वकालमें पराक्रमी कुमार कार्तिकेय असुरोंकी सेनामें उसका संहार करते हुए सुशोभित होते थे, उसी प्रकार अभिमन्यु कौरव-सेनामें विचरता हुआ शोभा पा रहा था ॥ २५-२६ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युपराक्रमे
एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युका
पराक्रमविषयक इकतालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल २६ १/२ श्लोक हैं।)