भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 343

जीवग्राहं जिघृक्षन्तं सौभद्रेण यशस्विना ॥ १४ ॥ संग्रामदुर्मदा राजन् राजपुत्राः प्रहारिणः । वयस्याः शल्यपुत्रस्य सुवर्णविकृतध्वजाः ॥ १५ ॥ तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महाबलाः । आर्जुनिं शरवर्षेण समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १६ ॥ राजन्! राजा शल्यके अभिमानी पुत्र रुक्मरथको जो अभिमन्युको जीते-जी पकड़ना चाहता था, यशस्वी सुभद्रकुमारके द्वारा मारा गया देख शल्यपुत्रके बहुत-से मित्र राजकुमार, जो प्रहार करनेमें कुशल और युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे, अर्जुनकुमारको चारों ओरसे घेरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। उनके ध्वज सुवर्णके बने हुए थे, वे महाबली वीर चार हाथके धनुष खींच रहे थे ॥ १४-१६ ॥ शूरैः शिक्षाबलोपेतैस्तरुरणैरत्यमर्षणैः । दृष्ट्वैकं समरे शूरं सौभद्रमपराजितम् ॥ १७ ॥ छाद्यमानं शरव्रातैर्हृष्टो दुर्योधनोऽभवत् । वैवस्वतस्य भवनं गतं ह्येनममन्यत ॥ १८ ॥ शिक्षा और बलसे सम्पन्न, तरुण अवस्थावाले, अत्यन्त अमर्षशील और शूरवीर राजकुमारोंद्वारा, किसीसे परास्त न होनेवाले शौर्यसम्पन्न सुभद्रकुमारको अकेले ही समरांगणमें बाणसमूहोंसे आच्छादित होते देख राजा दुर्योधनको बड़ा हर्ष हुआ। उसने यह मान लिया कि अब अभिमन्यु यमराजके लोकमें पहुँच गया ॥ १७-१८ ॥ सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्नानालिङ्गैः सुतेजनैः । अदृश्यमार्जुनं चक्रुर्निमेषात् ते नृपात्मजाः ॥ १९ ॥ उन राजकुमारोंने सोनेके पंखवाले नाना प्रकारके चिह्नोंसे सुशोभित और पैने बाणोंद्वारा अर्जुनकुमार अभिमन्युको पलक मारते-मारते अदृश्य कर दिया ॥ १९ ॥ ससूताश्वध्वजं तस्य स्यन्दनं तं च मारिष । आचितं समपश्याम श्वाविधं शललैरिव ॥ २० ॥ आर्य! सारथि, घोड़े और ध्वजसहित अभिमन्युके उस रथको मैंने उसी प्रकार बाणोंसे व्याप्त देखा, जैसे साही (सेह)-का शरीर काँटोंसे भरा रहता है ॥ २० ॥ स गाढविद्धः क्रुद्धश्च तोत्रैर्गज इवार्दितः । गान्धर्वमस्त्रमायच्छद् रथमायां च भारत ॥ २१ ॥ भारत! बाणोंसे गहरी चोट खाकर अभिमन्यु अंकुशसे पीड़ित हुए गजराजकी भाँति कुपित हो उठा। उसने गान्धर्वास्त्रका प्रयोग किया और रथमाया (रथयुद्धकी शिक्षामें निपुणता) प्रकट की ॥ २१ ॥ अर्जुनेन तपस्तप्त्वा गन्धर्वेभ्यो यदाहृतम् । तुम्बुरुप्रमुखेभ्यो वै तेनामोहयताहितान् ॥ २२ ॥