भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

तदनन्तर सुभद्राकुमारने कर्णके विचित्र युद्ध करनेवाले छः शूरवीर मन्त्रियोंको उनके घोड़े, सारथि, रथ तथा ध्वजसहित मार डाला ॥ ५ ॥ तथेतरान् महेष्वासान् दशभिर्दशभिः शरैः । प्रत्यविध्यदसम्भ्रान्तस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ६ ॥ इतना ही नहीं, उसने बिना किसी घबराहटके दस-दस बाणोंद्वारा अन्य महाधनुर्धरोंको भी आहत कर दिया। वह अद्भुत-सी बात थी ॥ ६ ॥ मागधस्य तथा पुत्रं हत्वा षड्भिरजिह्मगैः । साश्वं ससूतं तरुणमश्वकेतुमपातयत् ॥ ७ ॥ इसी प्रकार उसने मगधराजके तरुण पुत्र अश्वकेतुको छः बाणोंद्वारा मारकर उसे घोड़ों और सारथिसहित रथसे नीचे गिरा दिया ॥ ७ ॥ मार्त्तिकावतकं भोजं ततः कुञ्जरकेतनम् । क्षुरप्रेण समुन्मथ्य ननाद विसृजन् शरान् ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् हाथीके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले मार्त्तिकावतक नरेश भोजको एक क्षुरप्रद्वारा नष्ट करके अभिमन्युने बाणोंकी वर्षा करते हुए सिंहनाद किया ॥ ८ ॥ तस्य दौःशासनिर्विद्ध्वा चतुर्भिश्चतुरो हयान् । सूतमेकेन विव्याध दशभिश्चार्जुनात्मजम् ॥ ९ ॥ तब दुःशासनकुमारने चार बाणोंद्वारा अभिमन्युके चारों घोड़ोंको घायल करके एकसे सारथिको और दस बाणोंद्वारा स्वयं अभिमन्युको बींध डाला ॥ ९ ॥ ततो दौःशासनिं कार्ष्णिर्विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । संरम्भाद् रक्तनयनो वाक्यमुच्चैरथाब्रवीत् ॥ १० ॥ यह देख अर्जुनकुमारने क्रोधसे लाल आँखें करके सात बाणोंद्वारा दुःशासनपुत्रको बींध डाला और उच्च स्वरसे यह बात कही— ॥ १० ॥ पिता तवाहवं त्यक्त्वा गतः कापुरुषो यथा । दिष्ट्या त्वमपि जानीषे योद्धुं न त्वद्य मोक्ष्यसे ॥ ११ ॥ 'अरे! तेरा पिता कायरकी भाँति युद्ध छोड़कर भाग गया है। सौभाग्यकी बात है कि तू भी युद्ध करना जानता है; किंतु आज तू जीवित नहीं छूट सकेगा' ॥ ११ ॥ एतावदुक्त्वा वचनं कर्मारपरिमार्जितम् । नाराचं विससर्जास्मै तं द्रौणिस्त्रिभिराच्छिनत् ॥ १२ ॥ यह वचन कहकर अभिमन्युने कारीगरके माँजे हुए एक नाराचको दुःशासनपुत्रपर चलाया; परंतु अश्वत्थामाने तीन बाण मारकर उसे बीचमें ही काट दिया ॥ १२ ॥ तस्यार्जुनिर्ध्वजं छित्त्वा शल्यं त्रिभिरताडयत् । तं शल्यो नवभिर्बाणैर्गार्ध्रपत्रैरताडयत् ॥ १३ ॥ हृद्यसम्भ्रान्तवद् राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ।