महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएतत् कुरु महेष्वास राधेय यदि शक्यते ॥ २९ ॥ 'साथ ही इसके घोड़ोंकी वागडोरोंको, घोड़ोंको तथा दोनों पार्श्वरक्षकोंको भी नष्ट किया जा सकता है। महाधनुर्धर राधापुत्र! यदि कर सको तो यही करो ॥ २९ ॥
अथैनं विमुखीकृत्य पश्चात् प्रहरणं कुरु । सधनुष्को न शक्योऽयमपि जेतुं सुरासुरैः ॥ ३० ॥ 'अभिमन्युको युद्धसे विमुख करके पीछे इसके ऊपर प्रहार करो, धनुष लिये रहनेपर तो इसे सम्पूर्ण देवता और असुर भी जीत नहीं सकते ॥ ३० ॥
विरथं विधनुष्कं च कुरुष्वैनं यदिच्छसि । तदाचार्यवचः श्रुत्वा कर्णो वैकर्तनस्त्वरन् ॥ ३१ ॥ अस्यतो लघुहस्तस्य पृषत्कैर्धनुराच्छिनत् । अश्वानस्यावधीद् भोजो गौतमः पार्ष्णिसारथी ॥ ३२ ॥ 'यदि तुम इसे परास्त करना चाहते हो तो इसके रथ और धनुषको नष्ट कर दो।' आचार्यकी यह बात सुनकर विकर्तनपुत्र कर्णने बड़ी उतावलीके साथ अपने बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाते हुए अस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले अभिमन्युके धनुषको काट दिया। भोजवंशी कृतवर्मानि उसके घोड़े मार डाले और कृपाचार्यने दोनों पार्श्वरक्षकोंका काम तमाम कर दिया ॥ ३१-३२ ॥
शेषास्तु च्छिन्नधन्वानं शरवर्षैरवाकिरन् । त्वरमाणास्त्वराकाले विरथं षण्महारथाः ॥ ३३ ॥ शरवर्षैरकरुणा बालमेकमवाकिरन् । शेष महारथी धनुष कट जानेपर अभिमन्युके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार शीघ्रता करनेके अवसरपर शीघ्रता करनेवाले छः निर्दय महारथी एक रथहीन बालकपर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ ३३ १/२ ॥
स च्छिन्नधन्वा विरथः स्वधर्ममनुपालयन् ॥ ३४ ॥ खड्गचर्मधरः श्रीमानुत्पपात विहायसा । धनुष कट जाने और रथ नष्ट हो जानेपर तेजस्वी वीर अभिमन्यु अपने धर्मका पालन करते हुए ढाल और तलवार हाथमें लेकर आकाशमें उछल पड़ा ॥ ३४ १/२ ॥
मार्गैः सकौशिकाद्यैश्च लाघवेन बलेन च ॥ ३५ ॥ आर्जुनिर्व्यचरद् व्योम्नि भृशं वै पक्षिराडिव । अर्जुनकुमार अभिमन्यु कौशिक आदि मार्गों (पैतरों) द्वारा तथा शीघ्रकारिता और बल-पराक्रमसे पक्षिराज गरुड़की भाँति भूतलकी अपेक्षा आकाशमें ही अधिक विचरण करने लगा ॥ ३५ १/२ ॥
मय्येव निपतत्येष सासिरित्यूर्ध्वदृष्टयः ॥ ३६ ॥ विव्यधुस्तं महेष्वासं समरे छिद्रदर्शिनः ।