भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

त्वं हि संहारबुद्ध्याथ प्रादुर्भूता रुषो मम । तस्मात् संहर सर्वांस्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ॥ २१ ॥ मम त्वं हि नियोगेन ततः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि । ‘देवि! तू संहारबुद्धिसे मेरे रोषद्वारा प्रकट हुई है, इसलिये मूर्ख और पण्डित सभी प्रजाओंका संहार करती रह, मेरी आज्ञासे तुझे यह कार्य करना होगा। इससे तू कल्याण प्राप्त करेगी’ ।। २१ १/२ ।। एवमुक्ता तु सा तेन मृत्युः कमलोचना ॥ २२ ॥ दध्यौ चात्यर्थमबला प्ररुरोद च सुस्वरम् । ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वह मृत्युनामवाली कमलोचना अबला अत्यन्त चिन्तामग्न हो गयी और फूट-फूटकर रोने लगी ।। २२ १/२ ।। पाणिभ्यां प्रतिजग्राह तान्यश्रूणि पितामहः । सर्वभूतहितार्थाय तां चाप्यनुनयत् तदा ॥ २३ ॥