महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएतच्छ्रुत्वार्थवद् वाक्यं नारदेन प्रकाशितम् । उवाचाकम्पनो राजा सखायं नारदं तथा ॥ ५१ ॥ व्यासजी कहते हैं— युधिष्ठिर! नारदजीकी कही हुई यह अर्थभरी बात सुनकर राजा अकम्पन अपने मित्र नारदसे इस प्रकार बोले— ॥ ५१ ॥ व्यपेतशोकः प्रीतोऽस्मि भगवन्नृषिसत्तम । श्रुत्वेतिहासं त्वत्तस्तु कृतार्थोऽस्म्यभिवादये ॥ ५२ ॥ ‘भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! आपके मुँहसे यह इतिहास सुनकर मेरा शोक दूर हो गया। मैं प्रसन्न और कृतार्थ हो गया हूँ और आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ ॥ तथोक्तो नारदस्तेन राज्ञा ऋषिवरोत्तमः । जगाम नन्दनं शीघ्रं देवर्षिरमितात्मवान् ॥ ५३ ॥ राजा अकम्पनके इस प्रकार कहनेपर ऋषियोंमें श्रेष्ठतम अमितात्मा देवर्षि नारद शीघ्र ही नन्दन वनको चले गये ॥ ५३ ॥ पुण्यं यशस्यं स्वर्ग्यं च धन्यमायुष्यमेव च । अस्येतिहासस्य सदा श्रवणं श्रावणं तथा ॥ ५४ ॥ जो इस इतिहासको सदा सुनता और सुनाता है, उसके लिये यह पुण्य, यश, स्वर्ग, धन तथा आयु प्रदान करनेवाला है ॥ ५४ ॥ एतदर्थपदं श्रुत्वा तदा राजा युधिष्ठिर । क्षत्रधर्मं च विज्ञाय शूराणां च परां गतिम् ॥ ५५ ॥ सम्प्राप्तोऽसौ महावीर्यः स्वर्गलोकं महारथः । युधिष्ठिर! उस समय महारथी महापराक्रमी राजा अकम्पन इस उत्तम अर्थको प्रकाशित करनेवाले वृत्तान्तको सुनकर तथा क्षत्रियधर्म एवं शूरवीरोंकी परम गतिके विषयमें जानकर यथासमय स्वर्गलोकको प्राप्त हुए ॥ ५५ ॥ अभिमन्युः परान् हत्वा प्रमुखे सर्वधन्विनाम् ॥ ५६ ॥ युध्यमानो महेष्वासो हतः सोऽभिमुखो रणे । असिना गदया शक्त्या धनुषा च महारथः । विरजाः सोमसूनुः स पुनस्तत्र प्रलीयते ॥ ५७ ॥ महाधनुर्धर अभिमन्यु पूर्वजन्ममें चन्द्रमाका पुत्र था, वह महारथी वीर समरांगणमें समस्त धनुर्धरोंके सामने शत्रुओंका वध करके खड्ग, शक्ति, गदा और धनुषद्वारा सम्मुख युद्ध करता हुआ मारा गया है तथा दुःखरहित हो पुनः चन्द्रलोकमें ही चला गया है ॥ ५६-५७ ॥ तस्मात् परां धृतिं कृत्वा भ्रातृभिः सह पाण्डव । अप्रमत्तः सुसंनद्धः शीघ्रं योद्धुमुपाक्रम ॥ ५८ ॥