महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभीतर बहाया करती थीं ।। ६ ।।
कामान् वर्षति पर्जन्यो रूप्याणि विविधानि च । सौवर्णान्यप्रमेयाणि वाप्यश्च क्रोशसम्मिताः ।। ७ ।। मेघ अभीष्ट वस्तुओंकी तथा नाना प्रकारके रजत और असंख्य सुवर्णकी वर्षा करते थे। उनके राज्यमें एक-एक कोसकी लंबी-चौड़ी बावलियाँ थीं ।। ७ ।।
सहस्रं वामनान् कुब्जान् नक्रान् मकरकच्छपान् । सौवर्णान् विहितान् दृष्ट्वा ततोऽस्मयत वै तदा ।। ८ ।। उनमें सहस्रों नाटे-कुबड़े ग्राह, मगर और कछुए रहते थे, जिनके शरीर सुवर्णके बने हुए थे। उन्हें देखकर राजाको उन दिनों बड़ा विस्मय होता था ।। ८ ।।
तत् सुवर्णमपर्यन्तं राजर्षिः कुरुजाङ्गले । ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ।। ९ ।। राजर्षि सुहोत्रने कुरुजांगल देशमें यज्ञ किया और उस विशाल यज्ञमें अपनी अनन्त सुवर्णराशि ब्राह्मणोंको बाँट दी ।। ९ ।।
सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च । पुण्यैः क्षत्रिययज्ञैश्च प्रभूतवरदक्षिणैः ।। १० ।। उन्होंने एक हजार अश्वमेध, सौ राजसूय तथा बहुत-सी श्रेष्ठ दक्षिणावाले अनेक पुण्यमय क्षत्रिय-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ।। १० ।।
काम्यनैमित्तिकाजस्रैरिष्टां गतिमवाप्तवान् । स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।। ११ ।।