भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 412

वे कन्याएँ रथ, अश्व एवं हाथियोंपर आरूढ़ थीं। उनके साथ ही उन्होंने सौ-सौ घर, क्षेत्र और गौएँ प्रदान की थीं। राजाने सुवर्णमालामण्डित विशालकाय एक करोड़ गाय-बैलों और उनके सहस्रों अनुचरोंको दक्षिणारूपसे दान किया था॥ ७ १/२ ॥ हेमशृङ्ग्यो रौप्यखुराः सवत्साः कांस्यदोहनाः ॥ ८ ॥ दासीदासखरोष्ट्रांश्च प्रादादजाविकं बहु । सोनेके सींग, चाँदीके खुर और कांसेके दुग्ध-पात्रवाली बहुत-सी बछड़ेसहित गौएँ तथा दास, दासी, गदहे, ऊँट एवं बकरी और भेड़ आदि भारी संख्यामें दान किये॥ ८ १/२ ॥ रत्नानां विविधानां च विविधांश्चान्नपर्वतान् ॥ ९ ॥ तस्मिन् संवितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् । उस विशाल यज्ञमें नाना प्रकारके रत्नों तथा भाँति-भाँतिके अन्नोंके पर्वत-समान ढेर उन्होंने दक्षिणारूपमें दिये॥ ९ १/२ ॥ तत्रास्य गाथा गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ॥ १० ॥ उस यज्ञके सम्बन्धमें प्राचीन बातोंको जाननेवाले लोग इस प्रकार गाथा गाते हैं — ॥ १० ॥ अङ्गस्य यजमानस्य स्वधर्माधिगताः शुभाः । गुणोत्तरास्तु क्रतवस्तस्यासन् सार्वकामिकाः ॥ ११ ॥ 'यजमान अंगनरेशके सभी यज्ञ स्वधर्मके अनुसार प्राप्त और शुभ थे। वे उत्तरोत्तर गुणवान् और सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि करनेवाले थे'॥ ११॥ स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥ १२ ॥ सृंजय! राजा पौरव धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—इन चारों बातोंमें तुमसे बढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। श्वैत्य सृंजय! जब वे भी मर गये, तब तुम यज्ञ और दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। नारदजीने राजा सृंजयसे यही बात कही॥ १२॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयो- पाख्यानविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५७॥