महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 436, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपीकर मतवाले बने हुए सहस्रों मनुष्य वहाँ हर्षमें भरकर गाथा गाते, अम्बरीषकी स्तुतिसे युक्त कविताएँ पढ़ते और नृत्य करते थे ॥ ११ ॥ तेषु यज्ञेष्वम्बरीषो दक्षिणामत्यकालयत् । राज्ञां शतसहस्राणि दश प्रयुतयाजिनाम् ॥ १२ ॥ उन यज्ञोंमें राजा अम्बरीषने दस लाख यज्ञकर्ता ब्राह्मणोंको दक्षिणाके रूपमें दस लाख राजाओंको ही दे दिया था ॥ १२ ॥ हिरण्यकवचान् सर्वान् श्वेतच्छत्रप्रकीर्णकान् । हिरण्यस्यन्दनारूढान् सानुयात्रपरिच्छदान् ॥ १३ ॥ वे सब राजा सोनेके कवच धारण किये, श्वेत छत्र लगाये, सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हुए तथा अपने अनुगामी सेवकों और आवश्यक सामग्रियोंसे सम्पन्न थे ॥ १३ ॥ ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् । मूर्धाभिषिक्तांश्च नृपान् राजपुत्रशतानि च ॥ १४ ॥ सदण्डकोशनिचयान् ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत । उस विस्तृत यज्ञमें यजमान अम्बरीषने उन मूर्धाभिषिक्त नरेशों और सैकड़ों राजकुमारोंको दण्ड और खजानों-सहित ब्राह्मणोंके अधीन कर दिया ॥ १४ १/२ ॥ नैवं पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे ॥ १५ ॥ यदम्बरीषो नृपतिः करोत्यमितदक्षिणः । इत्येवमनुमोदन्ते प्रीता यस्य महर्षयः ॥ १६ ॥ महर्षिलोग उनके ऊपर प्रसन्न होकर उनके कार्योंका अनुमोदन करते हुए कहते थे कि असंख्य दक्षिणा देनेवाले राजा अम्बरीष जैसा यज्ञ कर रहे हैं, वैसा न तो पहलेके राजाओंने किया और न आगे कोई करेंगे ॥ स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदाक्षिण्यमभि शैत्येत्युदाहरत् ॥ १७ ॥ शैत्य सृंजय! वे पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी जीवित न रह सके, तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम यज्ञ और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। ऐसा नारदजीने कहा ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥