महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 453, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंन्यवसन्त यथाकामं वृक्षेषु च गुहासु च ॥ ७ ॥ सभी मनुष्य नीरोग थे। सबकी सारी इच्छाएँ पूर्ण होती थीं और उन्हें कहींसे भी कोई भय नहीं था। वे अपनी इच्छाके अनुसार वृक्षोंके नीचे और पर्वतोंकी गुफाओंमें निवास करते थे ॥ ७ ॥
प्रविभागो न राष्ट्राणां पुराणां चाभवत् तदा । यथासुखं यथाकामं तथैता मुदिताः प्रजाः ॥ ८ ॥ उस समय राष्ट्रों और नगरोंका विभाग नहीं था। सबको इच्छानुसार सुख और भोग प्राप्त थे। इससे यह सारी प्रजा प्रसन्न थी ॥ ८ ॥
तस्य संस्तम्मिता ह्यापः समुद्रमभियास्यतः । पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ ९ ॥ राजा पृथु जब समुद्रमें यात्रा करते थे, तब पानी थम जाता था और पर्वत उन्हें जानेके लिये मार्ग दे देते थे। उनके रथकी ध्वजा कभी खण्डित नहीं हुई थी ॥ ९ ॥
तं वनस्पतयः शैला देवासुरनरोरगाः । सप्तर्षयः पुण्यजना गन्धर्वाप्सरसोऽपि च ॥ १० ॥ पितरश्च सुखासीनमभिगम्येदमब्रुवन् । सम्राडसि क्षत्रियोऽसि राजा गोप्ता पितासि नः ॥ ११ ॥ देह्यस्मभ्यं महाराज प्रभुः सन्नीप्सितान् वरान् । यैर्वयं शाश्वतीस्तृप्तीर्वर्तयिष्यामहे सुखम् ॥ १२ ॥ एक दिन सुखपूर्वक बैठे हुए राजा पृथुके पास वनस्पति, पर्वत, देवता, असुर, मनुष्य, सर्प, सप्तर्षि, पुण्यजन (यक्ष), गन्धर्व, अप्सरा तथा पितरोंने आकर इस प्रकार कहा—'महाराज! तुम हमारे सम्राट् हो, क्षत्रिय हो तथा राजा, रक्षक और पिता हो। तुम हमें अभीष्ट वर दो, जिससे हमलोग अनन्त कालतक तृप्ति और सुखका अनुभव करें। तुम ऐसा करनेमें समर्थ हो' ॥ १०—१२ ॥
तथेत्युक्त्वा पृथुर्वैन्यो गृहीत्वाऽऽजगवं धनुः । शरांश्चाप्रतिमान् घोरांश्चिन्तयित्वाऽब्रवीन्महीम् ॥ १३ ॥ 'बहुत अच्छा' ऐसा ही होगा, यह कहकर वेनकुमार पृथुने अपना आजगव नामक धनुष और जिनकी कहीं तुलना नहीं थी, ऐसे भयंकर बाण हाथमें ले लिये और कुछ सोचकर पृथिवीसे कहा— ॥ १३ ॥
एह्येहि वसुधे क्षिप्रं क्षरैभ्यः काङ्क्षितं पयः । ततो दास्यामि भद्रं ते अन्नं यस्य यथेप्सितम् ॥ १४ ॥ 'वसुधे! तुम्हारा कल्याण हो। आओ-आओ, इन प्रजाजनोंके लिये शीघ्र ही मनोवांछित दूधकी धारा बहाओ। तब मैं जिसका जैसा अभीष्ट अन्न है, उसे वैसा दे सकूँगा' ॥ १४ ॥
वसुधोवाच