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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 459

ततः सप्तसहस्राणां कटुधूपमपाययत् ।। ७ ।।

एक सहस्र राजपूतोंके दाँत तोड़कर नाक और कान काट डाले तथा सात हजार

राजाओंको कड़ुवा धूप पिला दिया ।। ७ ।।

शिष्टान् बद्ध्वा च हत्वा वै तेषां मूर्ध्नि विभिद्य च ।

गुणावतीमुत्तरेण खाण्डवाद् दक्षिणेन च ।

गिर्यन्ते शतसाहस्रा हैहयाः समरे हताः ।। ८ ।।

सरथाश्वगजा वीरा निहतास्तत्र शेरते ।

पितुर्वधामर्षितेन जामदग्न्येन धीमता ।। ९ ।।

शेष क्षत्रियोंको बाँधकर उनका वध कर डाला। उनमेंसे कितनोंके ही मस्तक विदीर्ण

कर डाले। गुणावतीसे उत्तर और खाण्डव वनसे दक्षिण पर्वतके निकटवर्ती प्रदेशमें लाखों

हैहयवंशी क्षत्रिय वीर पिताके वधसे कुपित हुए बुद्धिमान् परशुरामजीके द्वारा समरभूमिमें

मारे गये। वे अपने रथ, घोड़े और हाथियोंसहित मारे जाकर वहाँ धराशायी हो

गये ।। ८-९ ।।

निजघ्ने दशसाहस्रान् रामः परशुना तदा ।

न ह्यमृष्यत ता वाचो यास्तैर्भृशमुदीरिताः ।। १० ।।

भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजोत्तमाः ।

परशुरामजीने उस समय अपने फरसेसे दस हजार क्षत्रियोंको काट डाला।

आश्रमवासियोंने आर्तभावसे जो बातें कही थीं, वहाँके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने 'भृगुवंशी परशुराम!

दौड़ो, बचाओ' इस प्रकार कहकर जो करुण क्रन्दन किया था, उनकी वह कातर पुकार

परशुरामजीसे नहीं सही गयी ।। १० १/२ ।।

ततः काश्मीरदरदान् कुन्तिक्षुद्रकमालवान् ।। ११ ।।

अङ्गवङ्गकलिङ्गांश्च विदेहांस्ताम्रलिप्तकान् ।

रक्षोवाहान् वीतिहोत्रांस्त्रिगर्तान् मार्तिकावतान् ।। १२ ।।

शिबीनन्यांश्च राजन्यान् देशान् देशान् सहस्रशः ।

निजघान शितैर्बाणैर्जामदग्न्यः प्रतापवान् ।। १३ ।।

तदनन्तर प्रतापी परशुरामने काश्मीर, दरद, कुन्ति, क्षुद्रक, मालव, अंग, वंग, कलिंग,

विदेह, ताम्रलिप्त, रक्षोवाह, वीतिहोत्र, त्रिगर्त, मार्तिकावत, शिबि तथा अन्य सहस्रों देशोंके

क्षत्रियोंका अपने तीखे बाणोंद्वारा संहार किया ।। ११-१३ ।।

कोटीशतसहस्राणि क्षत्रियाणां सहस्रशः ।

इन्द्रगोपकवर्णस्य बन्धुजीवनिभस्य च ।। १४ ।।

रुधिरस्य परीवाहैः पूरयित्वा सरांसि च ।

सर्वानष्टादश द्वीपान् वशमानीय भार्गवः ।। १५ ।।

ईजे क्रतुशतैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ।