भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 463

नारदजीने कहा— राजन्! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा शोक दूर हो गया। अब तुम्हारी जो इच्छा हो, यहाँ मुझसे माँग लो। तुम्हारी वह सारी अभिलषित वस्तु तुम्हें प्राप्त हो जायगी। हमलोग झूठ नहीं बोलते हैं ॥ ६ ॥

सृञ्जय उवाच

एतेनैव प्रतीतोऽहं प्रसन्नो यद्भगवान् मम ।
प्रसन्नो यस्य भगवान् न तस्यास्तीह दुर्लभम् ॥ ७ ॥
संजयने कहा— मुने! आप मुझपर प्रसन्न हैं, इतनेसे ही मैं पूर्ण संतुष्ट हूँ। जिसपर आप प्रसन्न हों, उसे इस जगत्में कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ७ ॥

नारद उवाच

मृतं ददानि ते पुत्रं दस्युभिर्निहतं वृथा ।
उद्धृत्य नरकात् कष्टात् पशुवत् प्रोक्षितं यथा ॥ ८ ॥
नारदजीने कहा— राजन्! लुटेरोंने तुम्हारे पुत्रको प्रोक्षित पशुकी भाँति व्यर्थ ही मार डाला है। तुम्हारे उस मरे हुए पुत्रको मैं कष्टप्रद नरकसे निकालकर तुम्हें पुनः वापस दे रहा हूँ ॥ ८ ॥

व्यास उवाच

प्रादुरासीत् ततः पुत्रः सृञ्जयस्याद्भुतप्रभः ।
प्रसन्नेनर्षिणा दत्तः कुबेरतनयोपमः ॥ ९ ॥
व्यासजी कहते हैं— युधिष्ठिर! नारदजीके इतना कहते ही सृंजयका अद्भुत कान्तिमान् पुत्र वहाँ प्रकट हो गया। उसे ऋषिने प्रसन्न होकर राजाको दिया था। वह देखनेमें कुबेरके पुत्रके समान जान पड़ता था ॥ ९ ॥
ततः संगम्य पुत्रेण प्रीतिमानभवन्नृपः ।
ईजे च ऋतुभिः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ १० ॥
अपने उस पुत्रसे मिलकर राजा सृंजयको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त पुण्यमय यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया ॥ १० ॥
अकृतार्थश्च भीतश्च न च सान्नाहिको हतः ।
अयज्वा त्वनपत्यश्च ततोऽसौ जीवितः पुनः ॥ ११ ॥
सृंजयका पुत्र कवच बाँधकर युद्धमें लड़ता हुआ नहीं मारा गया था। उसे अकृतार्थ और भयभीत अवस्थामें अपने प्राणोंका त्याग करना पड़ा था। वह यज्ञकर्मसे रहित और संतानहीन भी था। इसलिये नारदजीने पुनः उसे जीवित कर दिया था ॥ ११ ॥
शूरो वीरः कृतार्थश्च प्रताप्यारीन् सहस्रशः ।
अभिमन्युर्गतो वीरः पृतनाभिमुखो हतः ॥ १२ ॥